Wednesday, December 11, 2013

मेरे दिवान-ए-इश्‍क में उसनें नया हर्फ़ खिंचा है

मेरे दिवान-ए-इश्‍क में उसनें नया हर्फ़ खिंचा है
करता इश्‍क हूं या इबादत,आज मुझसे पुछा है

फिरता रहा चश्‍माए खिज्र की तलाश में दरबदर
पांव के छालों का सबब, आज मुझसे पुछा है

फ़ानूस बनके खड़ा रहा हर दौरे मुश्किल में
लगा दूं मरहम तेर हाथों पर,आज मुझसे पुछा है

फिकरों,तानों,लफ़जों के वो बस तीर चलाता रहा
ये रंग है या खूनें जिगर,आज मुझसे पुछा है

चल पड़ा है थाम के वो गैर का हाथ 'फ़राज़'
इश्‍क में दोगे जान या मुझपर,आज मुझसे पुछा है
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

Kuchh Khayaal....

अपनीं गज़लों नज्‍़मों का हिस्‍सा बना के रखा है
जमानें के लिये मोहब्‍बत का किस्‍सा बना के रखा है
मेरे इश्‍क के नशे में हरपल गुडगुडाती रहती है
प्‍यार को मेरे उसनें यारो हुक्‍का बना के रखा है
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

आजकल वक्‍त मेरा साथ नहीं देता
तुमसे बिछडकर कोई साथ नहीं देता
उम्रभर क्‍या निभाऐंगे वादे वफ़ा मुझसे
इक रात के लिये भी जो साथ नहीं देता
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज'

तेरी ऑंखो का इंतिजार मैनें देखा है

तेरी ऑंखो का इंतिजार मैनें देखा है
हंसी में गम को छुपाना मैंनें देखा है

घंटो खडी रहती हो ऐतबारे वफा पे मेरी
सिनें में उभरती टीस का दर्द मैनें देखा है

बडा सुकून है तेरी आंखों में, है झील सी गहराई
जहन में है मगर जलजला बहोत, मैंने देखा है

समेट लेना मुझे बाहों में, ओस सा पिघल जाना
हर जख्‍़म पर, मुठ्ठीयों का भिंचना, मैनें देखा है

फ़राज़ उसके लबों को देख, है वो गुलाब कि मानिंद
सूरज के ढलते ही इनका मुर्झा जाना , मैनें देखा है
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

गुडिया बस् मेरी दिवानी है

जैसे कोई सपनां देख रही हूं शायद...तुम्‍हारा
कितनी सहज मुस्‍कान...
अचानक से रोना
अपनें में ही हंसना
मैं सामनें हूं...... फिर भी
जाने किस से...... बांते करती रहती हो
जब, मन करता है, तुम्‍हारे साथ खेलनें का
तो, सोती रहती हो....
मैं भी नां....
जानें क्‍या क्‍या सोचनें लगी हूं
दिन ही कितनें हुए है तुमको आए......
मगर.....
एक अंजाना यथार्थ, मुझे सतानें लगता है
जब भी खना बनाती हूं नां...
तो, ज्‍यादा डर जाती हूं
हल्‍दी जब हाथों में, लेती हूं.....
एक पल को भी आंसू नहीं थमते
मगर.....
अब सोच लिया है
इतना दूर तक नहीं सोचूंगी
तुम्‍हारी तरह, निश्‍चल बनके
तुम्‍हारे साथ रहूंगी
अभी तो....
कितनी सारी लोरीयां गानी है
कितनें किससे, कहानियां सुनानीं है
जानती हूं..... मैं
सब हैं दिवानें मेरी गुडिया के
और...... गुडिया बस्
मेरी दिवानी है
................ गुडिया बस्
मेरी दिवानी है

कल्‍पना एवं संवाद -
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Wednesday, October 23, 2013

कोजागिरी दिन

दिनांक 19 ओक्‍टोबर 2013 रोजी मराठी संस्‍कृती मंडळ, जानकी नगर, येथे ‘’कोजागिरी दिन’’ चे आयोजन करण्‍यात आले, या कार्यक्रमा अंतर्गत श्रीमती अरूणा परांजपे व साथी यांनी सुमधुर गीतांची प्रस्तुती दिली, तबल्‍यावर संगत केली प्रसिध्‍द तबला वादक श्री रानडे जी, हारमोनियम वर श्री चांदोरकर जी, वायलिन वर श्री कुंटे जी, कार्यक्रमाच्‍या प्रारंभी सर्वांचे स्‍वागत करण्‍यात आले व नंतर कार्यक्रमास सुरवात करण्‍यात आली, कार्यक्रमात उपस्थित श्रोत्‍यांनी भावगीत, नाट्यगीत एवं भक्तिगीतांचा भरपूर आनंद घेतला.

आयोजनास विशेष निर्देशन व सहयोग अध्‍यक्ष डॉ. श्री शरद महाजन व सचिव श्री विजय फणसळकर यांचे होते.

सहयोगी कार्यकर्ते होते.......
श्री विजय परेतकर , नारायण तेलंग, संजय आपटे, प्रकाश वाते, मनीष गुजराती, सुहास कोरडे, आर.के. खेर, धनंजय बेहरे, गोविन्‍द पांडे, संदिप रिसबुड, सुधीर कळसकर, सचिन दाभाडे, दिलीप जोशी, प्रमोद वडसमुद्रकर

Monday, October 21, 2013

तस्‍वीर से मोहब्‍बत कर बैठा

मेरा दिल इक मासूम पतंगा......, शोले से उल्‍फत कर बैठा
भेजी थी इक तस्‍वीर किसीनें, तस्‍वीर से मोहब्‍बत कर बैठा

सारे नज़ारे बदल गये, रंग ओ बू के इशारे बदल गये
संगीन था दिल का आलम, सब वो रंगीन कर बैठा
भेजी थी इक तस्‍वीर किसीनें........

वो चांद जो साथ चांदनी के, मुझे जलया करता था
देख मेरी उजली चांदनी...., आज अमावस कर बैठा
भेजी थी इक तस्‍वीर किसीनें........

दिवानगी है ये तेरे इश्‍क की, आग भी पानी लगती है
मेरी आंख से बहता कतरा... , आज समंदर बन बैठा
भेजी थी इक तस्‍वीर किसीनें........

लब गुलाब के फूल हो जैसे, या कोई चश्‍मा–ए-इश्‍क
फ़राज़ जाने किसके नाम ये, दिल की दौलत कर बैठा
भेजी थी इक तस्‍वीर किसीनें........
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Sunday, September 08, 2013

तेरी दुनिया, मेरी दुनियां से, अब अलग कहां है



तेरी दुनिया, मेरी दुनियां से, अब अलग कहां है
मैं गर जागता हूं रातों को,तो सोती तू भी कहां है

फासले इतनें भी नहीं, तेरे मेरे दरमियां,के लौट ना सकें
घुट के रह जाती है सदायें मेरी,आवाज़ देती तू भी कहां है
तेरी दुनिया, मेरी दुनियां से, अब अलग कहां है
मैं गर जागता हूं रातों को, तो सोती तू भी कहां है

वस्‍ले इंतिजार में,ग़मों को नासूर बना के रख्‍खा है
क्‍यो ना कुरेदूं जख्‍़मों को,मरहम तू भी लगाती कहां है
तेरी दुनिया , मेरी दुनियां से , अब अलग कहां है
मैं गर जागता हूं रातों को , तो सोती तू भी कहां है

सैयाद का क़फ़स ही है अब, लैला का नसीब़ फ़राज़
पर कतरे हो जिसके, वो चिडिया फिर उडती कहां है
तेरी दुनिया , मेरी दुनियां से , अब अलग कहां है
मैं गर जागता हूं रातों को , तो सोती तू भी कहां है
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Monday, August 26, 2013

सीप से यूं मोती बरसना, मेरी नज़र से देखनां तुम


क्‍या कयामत लगती है वो, मेरी नज़र से देखनां तुम
चांद का यूं जमी पर चलना, मेरी नज़र से देखनां तुम

शहजादी है वो गुलोंकी, बहारे चमन है, इक कली का
यूं, फूल बन जाना, मेरी नज़र से देखनां तुम.......


शोलाऐ हुस्‍न है वो , मगर..... .हरपल इश्‍क बरसाती है
सुबहो-शाम का कलमा पढना,मेरी नज़र से देख्‍नां तुम

जिसनें भी उससे नज़र मिलाई, ज़ख्‍में दिल हुआ है वो
नज़रों से उसका ख़ंजर चलाना,मेरी नज़र से देखनां तुम   

बेशकिमती है ये अश्‍क फ़राज़, इसे जाया नां करनां
सीप से यूं मोती बरसना, मेरी नज़र से देखनां तुम

मेरे पहलू में आकर भी  यारों, वो मेरी ना बन सकी
लकीरों का हाथों से मिट जाना, मेरी नज़र से देखना तुम
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Friday, August 16, 2013

तुझ्याशीच तुला मागायचं होतं

तुला बरचं काही सांगायचं होतं
खरंतर तुझ्याशीच तुला मागायचं होतं
तू जवळ असली, की...........
सर्व काही विसरायला होतं
मग.......
तुझ्याशी बोलणं, तुला बरचं काही सांगणं
राहुन जातं.....
जसं तू जवळ नसतानां,
पापण्‍यांतून पाणी वाहून जातं |
हल्‍ली.....
तुझ्याशी बोलायला, शब्‍दच सुचत नाहीं
तुझ्या शिवाय तनां-मनांत, कोणी सुध्‍दा उरत नाहीं
मनाला एक वेगळीच, हुर-हुर......
की....... तुझं मनं माझ्या साठी झुरत नाहीं
मलां सगळं कळतयं गं,
पण मनं तरीही वळणार नाही,
अंतर हे आपल्या मधले,
कधी सुध्‍दा गळणार नाहीं...............
जगात चाली-रिती बदलल्‍यात, पण......
घरच्‍यांना, पटनार नाहींत,
तुझीच हाईल दशा, मग....
जात्‍यातील धान्‍यां सारखी, पण मी आता ठरवलंय,
आपल्‍या स्‍वप्‍नांना अडवलंय, फक्‍त एकदा...........
एकदाच...................
तुला भेटायचं होतं.................
तुला बरचं काही सांगायचं होतं
खरंतर.................. तुझ्याशीच तुला मागायचं होतं
खरंतर................तुझ्याशीच तुला मागायचं होतं
राहुल उज्‍जैनकर ‘फ़राज़’

आजाना किसी रोज, वक्‍त मिले तो....


आजाना किसी रोज, मज़ारे इश्‍क पर , वक्‍त मिले तो
बडी मुद्दत से तम्‍मना है, तुझे देखने की वक्‍त मिले तो

तेरी खुशी के लिये , ख़ाक हुआ हूं, इश्‍के इंम्तिहान में
इक दिया तो रौशन कर दिया करो, वक्‍त मिले तो

अब कहां उजाले तरे नूर के , कहां वो संदल सा बदन
दामन ही चढा जाना अपनां, किसी रोज,वक्‍त मिले तो

रोज जिसे दाना चुगाकर, भेज देती हो तुम, मेरे पास
उसे भी कर दो, आज़ाद किसी रोज, वक्‍त मिले तो

तुझ से बढ़कर तो, अब तेरे, आशिक पर प्‍यार आता है ‘फ़राज़’
रोज मिन्‍नतें करता है,तेरे दिल से निकल जाउं,‘वक्‍त मिले तो’
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़