Saturday, August 05, 2017

कुछ खयाल बिखरे से....


बिछड़कर तुझसे लफ्ज़ भी, शरारत करने लगे
मैं तड़पने लगा, बिस्तर पे, वो ग़ज़ल कहने लगे
©®राहुल फ़राज़


मेरी किस्मत में कहां है
मोहब्बत की सोहबत देखो
करवटें इधर बदल रहा मैं,
तुम उधर जागती रही देखो
©®राहुल फ़राज़

सामने होती तो, तेरी पेशानी चूम लेता
ज़रा, मासूम है तरीका, मेरी ईबादत का ।
©®राहुल फ़राज़ 
 
चार पल क्या गुजार दिए, तेरी जानों पे
आजकल,शहंशाह बने फिरता हूँ, जमाने मे
©®राहुल फ़राज़ 

म्युझे कहाँ जीने की, आरज़ू है, फ़राज़
शर्त इतनी है, वो मरने को मजबूर करें
©®राहुल फ़राज़ 

बताओ मेरे इश्क का कितना असर होता है

मैं, तड़पता हूं यहां, क्या तुम्हे दर्द होता है ??
बताओ मेरे इश्क का कितना असर होता है

भरी बारिश में, भीगता रहता हूँ, सरे राह
आंखों से रिसते नमक का, असर होता है ?
बताओ मेरे इश्क का कितना असर होता है

छलनी हो जाता है, जिगर मेरा, लोगों की बातों से
लफ़्ज़ों में भी, तलवार से गहरा असर होता है।
बताओ मेरे इश्क का कितना असर होता है

उसकी ज़ुल्फ़ों से घिर आती है, घटाएं अल्लाह!!
गेसुओं में भी, घने बादलों सा असर होता है
बताओ मेरे इश्क का कितना असर होता है

किसी को टूट कर चाहना ईसे कहते है, फ़राज़
तुम उधर तड़पते हो, इधर असर होता है
बताओ मेरे इश्क का कितना असर होता है
©®राहुल फ़राज़ 


दम निकलता क्यूं नहीं

मोती बनकर, मेरी आँख से बहता क्यूं नहीं
साँस रुकती है, मगर, दम निकलता  क्यूं नहीं

वो लगाते है मेरी, हिज्र की रातों का हिसाब
मेरे हिस्से में कोई ग़म, निकलता  क्यूं नहीं
साँस रूकती है मगर......

जब जलाते है मुझे, किसी शम्मा की तरह
मैं गर, मोम हूं, तो पिघलता  क्यूं नहीं
साँस रूकती है मगर...

माना के, मैं बेवफा हूं, मगर ये बता मुझको
दिल-ए-आईने में अक्स दूसरा उभरता  क्यूं नहीं
साँस रूकती है मगर...

टूटे तारे को देखकर, सबने मांग लिया कया क्या
मेरे हिस्से का फ़राज़,कोई तारा टूटता  क्यूं नहीं
साँस रूकती है मगर...
©®राहुल फ़राज़