Saturday, December 15, 2012

भूलता जा रहा हूं सब


भूलता जा रहा हूं सब
अपनें अतित के पन्‍ने
दिनों पहले सहेज कर
रख दिये थे कहीं.....मैंने...
अचानक से मिल गये कुछ....
हर इक सफे पर
हर एक लफ्ज
अब भी ताजा मालूम देता है.......
खेत की सरहद पर लगी
इमली की तरह
हलक से उतर कर
दिमाग को सुकुन देती.....
बारीश के मौसम में
तुम्‍हारे आंचल की छत जैसा
अरसा हो गया....
बारीश में भिगे...
ठिठुरते हाथों में
चाय की प्‍याली थामें....
और भी बहोत से पन्‍ने थे
मगर.....
भूलता जा रहा हूं सब.....
    भूलता जा रहा हूं सब.....
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

क्‍या ये जरूरी है.....?


क्‍या ये जरूरी है ?
मेरे ही बीज से बने वो
मेरे ही रूप रंग में ढले वो
क्‍या ये जरूरी है.....?
फिर हमारे रक्‍त संबंधों का क्‍या
सब मिथ्‍या है
कोई मोल नहीं इसका
फिर भी साथ रहना....
क्‍या ये जरूरी है.....?
हमारा कुनबा, हमारा खानदान
सिर्फ खोखले शब्‍द है
या किसी स्‍वार्थ की डोर से बंधे
जिने को मजबूर
क्‍या ये जरूरी है......?
मेरे बीज से ना होना
सब संबंधो का मिथ्‍या होना है
अलावा इसके
क्‍या अलग है हम ?
संवेदना, प्रेम, दुःख
अश्रुओं का खारापन
क्‍या अलग है ?
इन सबको नज़र अंदाज करना
क्‍या ये जरूरी है......?
 क्‍या ये जरूरी है......?
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Wednesday, December 12, 2012

जेव्‍हा शब्‍द सुचत नाहीं..

जेव्‍हा शब्‍द सुचत नाहीं.............

आवरता येत नाही भावनांचा वेग
नियतीचा तोल
डोळ्रयांतील अश्रुंचा वेग
पावसाच्‍या सरी कोसळतात
पूर येतो पापण्‍यांच्‍या काठेला
सर्व काही धुकं, होत जातं
मन हे शब्‍दां वाचून मुकं होत जातं
जेव्‍हा शब्‍द सुचत नाहीं.............
डोळ्रयांतील पाण्‍याला
कोणीच झेलत नाही
बांध फुटतो,हुंदके येतात
मन तरी वळत नाहीं
कुणाला ही माझी व्‍यथा
कशीच कां कळत नाही
कुण्‍याच्‍याही मनांत
पश्‍चातापाचे अंकुर ही फुटत नाहीं
जेव्‍हा शब्‍द सुचत नाहीं.............
रोज रात्री तुझीच आठवण
तुझ्याच कुशी साठी
माझं..हरवलेलं बालपण
शोधत राहते..चंद्रा बरोबर
तो ही एकटाच असतो
काही सुध्‍दा बोलत नाहीं
जुणु त्‍याला ही माझ्या
भावना काही कळत नाहीं
किंवा...शब्‍दां वाचून
बोलावं काय
त्‍याला ही सुचत नाहीं
अशीच होते दशा
आपली, जेव्‍हा शब्‍द सुचत नाही
     जेव्‍हा शब्‍द सुच नाहीं.............
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़' 

जरी पराधीन आहे,जगती जन्‍म मानवाचा......


जरी पराधीन आहे,जगती जन्‍म मानवाचा......

घेई जन्‍म बाळ,त्‍यासी
न कळे धर्म कैचा
कळे ना जात कैची, न भाषा
जन्‍मला माय पोटी
ओळखी माय भाषा
जरी पराधीन आहे,जगती जन्‍म मानवाचा......
जाणतो हा सर्व मर्म
बंधनें ही मिथ्‍या सारी
तरीं, दंभ जपूनी आपले
करितो हा अहं भारी
स्‍वयं कां रंगविले तू...?
स्‍वप्‍न आपले राजकुमारी
तुटले नाते, उरली न कुणाची
कां, छळियले मज नाना प्रकारी....?
अहं सर्व, अहं ब्रम्‍ह
असा कसा हा गुण मानवाचा....?
जरी पराधीन आहे,जगती जन्‍म मानवाचा......
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

Sunday, December 09, 2012

घर में जब आते हो,तो ठहर क्‍यों नहीं जाते



तेरा मेरे खयालों में ये,आना जाना किस लिये
ज़ख्‍मों को हरपल,हरा करते रहना किस लिये
घर में जब आते हो,तो ठहर क्‍यों नहीं जाते
अश्‍क बनकर फिर यूं निकल जाना किस लिये.......


रास्‍ते जब बदल गये,तो मिलना किस लिये
उम्‍मीदें टुट गयी,तो फिर जुडना किस लिये
कहकर तो गये थे,तुझसे कोई वास्‍ता न रहा
दिवानें की तरह मेरा नाम,पुकारना किस लिये.......


ये जश्‍न ये आराईश ये मिनाकारी किस लिये
ये संदल की महक,ये जिस्‍में रौनक किस लिये
मैयत में कभी शादी का, कलमा नहीं पढतें
फ़राज के नाम कि मेंहंदी फिर सजाना किस लिये........
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

Sunday, December 02, 2012

मैं मौन क्‍यों हो जाता हूं ?

मैं मौन क्‍यों रह जाता हूं

इतने कष्‍ट, संताप तुम्‍हारे
सारे क्‍युं मै सहता हूं.....
ठुकराती हो तुम हर बार
मगर....
खामोश खडा रह जाता हूं
ऑखों में लाकर आंसु
जब....
मुझसे लिपट तुम जाती हो
उस एक पल में मैं
स्‍वयं कुबेर हो जाता हूं...
अब समझी ?
अक्‍सर,मैं मौन क्‍यों हो जाता हूं.....

नैनों से छुप नहीं पाता
मृदुल और अलौकिक नेह
गौण हो जाती है
अपनें बीच
नश्‍वर और मतवाली देह
घटा बनकर बरसती हो
जब तुम......
मैं मयुर बन जाता हूं
अब समझी ?
अक्‍सर मैं मौन क्‍यों हो जाता हूं.........

कभी रौद्र कभी संयम में
रहती अल्‍हड नदी सी तुम
कलरव का होता आभास
कभी...
कभी... झंकार पायल की
बहती रहती अविरत ..निश्‍चल
कभी..
कभी, तान सुनाती कोयल की
तुम्‍हारे मिलन की चाह में,मैं
सागर गहरा बन जाता हूं
अब समझी ?
अक्‍सर, मैं मौंन क्‍युं हो जाता हूं

प्रेम की परिभाषा हो तुम
भक्ति में डूबी गाथा
छल-कपट हर द्वेश सहती
मगर.....
टुट ना पाता, तेरा मेरा नाता
मीरा जब तुम बन जाती हो
मैं तब श्‍याम हो जाता हूं
अब समझी ?
अक्‍सर, मैं मौन क्‍यूं हो जाता हूं
          मैं मौन क्‍यूं हो जाता हूं
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़' 

Saturday, December 01, 2012

कितनी जल्‍दी सबकुछ खत्‍म हो गया

कितनी जल्‍दी, सबकुछ अचानक से
खत्‍म हो गया
मेरे हृदय का कृंदन
तुम्‍हारे 
गुंज में शहनाई की
लुप्‍त हो गया
तुम सुनती भी कैसे ?
इतनें कोलाहल में
मेरे स्‍वप्‍नों का
टुटकर बिखर जाना

कितनीं सादगी से
तुमनें
अपनें हाथों में मेहंदी
रचाली
ऑंखों से बहते मेरे
हृदय रक्‍त को
सहेज कर

व्‍यर्थ ही तो जायेंगे अब
मेरे अरमानों के ये
पंख सारे
ले लो इन्‍हे......
अपनें नये घौंसले में
सजा लेना...
एक नयी दुनिया अपनी
बसा लेना...

तीव्र है अभी ज्‍वाला
जलती हुई आशाओं की...
तप्‍त है भावनाऐं
स्‍वाहा होने को आतुर..

प्रत्‍येक स्‍वप्‍न,प्रत्‍येक क्षण
चुंबन - आलिंगन के वो
निरव क्षण...
भस्‍म होने को लालायित है
उठ रही है जबतक..
उंची ये लौ..
फेरे सात लगा लो तुम
फिर करके सदा को..
विस्‍मृत मुझे......
सेज-सुहाग की सजा लो तुम
     सेज-सुहाग की सजा लो तुम
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

मर कर तो लाश भी,दो गज़ में सिमट जायेगी

नां ज़र जायेगा नां जमीं,ख़ाक भी छुट जायेगी
डोर हमारे सांसों की,जानें कब टुट जायेगी
किस के लिये भरनां है ये,आराईशों की पेटियां
मर कर तो लाश भी,दो गज़ में सिमट जायेगी
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'