Tuesday, June 26, 2012

फलक की जन्‍नत मेरी निगाहों में है


नूर-ए-आफताब0 तेरी निगाहों मे है |
आसमां का चांद तेरी आरिजों1 में है ||
गेसुओं में समेटा है,घटाओं को तुमनें |
कत्‍लेआम इस दिले गरीबखानें में है ||
या खुदा 'फराज' जिंदा है या मुर्दा |
फलक2 की जन्‍नत मेरी निगाहों में है ||
राहुल उज्‍जैनकर 'फराज' 

0=सूर्य का तेज

1=रूखसार, गाल
2=आसमान, आकाश 

हर गम, हर खुशी, हर अपनें, में तलाश करता हूं
हर कायनात, हर जर्रे, हर शै, में तलाश करता हूं
बनकर प्‍यार, 'फराज'के दिल में समानें वाले
तुझे दिल के हर इक कोने में तलाश करता हूं
राहुल उज्‍जैनकर 'फराज'
 

Sunday, June 24, 2012

हम आजकल उनसे खफा हुए बैठे है

बिमारे दिल की जैसे दवा हुए बैठे है
हम आजकल उनसे खफा हुए बैठे है

ना रास्‍तों का पता,न मंजिल का
नां कारवां की तलाश,ना साहिल की
सोया नहीं मैं जाने कितनी सदियों से
आज याद आया,तो हिसाब लिये बैठे है
हम आजकल......

फिर वो रूठ जायेगी मेरे मनाने के बावजूद
फिर आंसू बहायेगी मेरे हसांने के बावजूद
मुझसे भी जज्‍ब होता नहीं ये आलम,वो आये तो
हम आज अपनी ऑखों में,सैलाब लिये बैठे है
हम आजकल......

मेरी रूह तक पहुंचे थे तुम,कभी ऑंखो के रास्‍ते
मुझपर ही खत्‍म होते थ्‍ो तेरी उम्‍मीदों के रास्‍ते
सोचता हूं सौंप दूं तुम्‍हे वापस रिश्‍तों के अवशेष
बेडियां जो पांवो में थी,हाथों में लिये बैठे है
हम आजकल ........

क्‍या खोया,क्‍या पाया और नहीं सोचा जाता
रिश्‍तों का यूं बिखरनां,और नहीं देखा जाता
'फ़राज़'इन रिसते जख्‍मों पर मरहम तो रख
कब से हम अपनीं आंखों में नमक लिये बैठे है
हम आजकल उनसे खफा हुए बैठे है..........

राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

Wednesday, June 06, 2012

'फराज' को मरनें के वो रोज नये मशविरे देता है


देखिये हुस्‍न कैसे कैसे फरेब देता है 
पलके उठाकर नजरों से जहर देता है 

तजुर्बा भी शरमा जाये, इक पल के लिये 
बच्‍चा आज का ऐसे-ऐसे सवाल देता है 
देखिये ........ 

तुमनें नही सुना होगा, मगर आज ऐसा होता है 
लोग सच्‍चे हो, तो आईना भी वहम देता है 
देखिये.......... 

नये जमानें के नये तेवर है, क्‍या कहें 
मेरा घर ठीक से जले, इसलिये पडोसी हवा देता है
तुमको गये..............

जोश में हमनें कह दिया था इश्‍क में जान देंगे
'फराज' को मरनें के वो रोज नये मशविरे देता है
राहुल उज्‍जैनकर ''फराज'' 

तुमका गये अर्सा हो गया

वक्‍त बे वक्‍त यूं ही, बस मुस्‍कुराने को दिल करता है 
तुमका गये अर्सा हो गया, अब भुलानें को दिल करता है 

तेरे मेरे बीच कभी इकरार हुआ करता था 
यादों से अब तेरी तकरार को दिल करता है 
तुमको गये........... 

उजाले भर का साथ्‍ा नहीं, ये यकिन दिलाया करती थी 
अंधेरों को आज गले लगा, बहकनें को दिल करता है 
तुमको गये........... 

लब हमारे यूं मिले थे, मानों दो जिस्‍म रूह एक हुई 
अपनें हिस्‍से की कजा पर, जश्‍न करनें को दिल करता है
तुमको गये................. 

उसमें ना जुनुने इश्‍क था, ना वफा, ना कोई जज्‍बात 
'फराज' तेरी दिवानगी पर, लानते देनें को दिल करता है
तुमको गये अर्सा हो गया............... 

राहुल उज्‍जैनकर 'फराज'

Tuesday, June 05, 2012

हमें हार-जीत से क्‍या

 हार जीत की कश्‍मकश में वो पडते है जिन्‍हे कुछ कर दिखाना हो
अरे,जमानें में हम खुद एक मिसाल है हमें हार-जीत से क्‍या
राहुल उज्‍जैनकर ''फराज''