Monday, August 26, 2013

सीप से यूं मोती बरसना, मेरी नज़र से देखनां तुम


क्‍या कयामत लगती है वो, मेरी नज़र से देखनां तुम
चांद का यूं जमी पर चलना, मेरी नज़र से देखनां तुम

शहजादी है वो गुलोंकी, बहारे चमन है, इक कली का
यूं, फूल बन जाना, मेरी नज़र से देखनां तुम.......


शोलाऐ हुस्‍न है वो , मगर..... .हरपल इश्‍क बरसाती है
सुबहो-शाम का कलमा पढना,मेरी नज़र से देख्‍नां तुम

जिसनें भी उससे नज़र मिलाई, ज़ख्‍में दिल हुआ है वो
नज़रों से उसका ख़ंजर चलाना,मेरी नज़र से देखनां तुम   

बेशकिमती है ये अश्‍क फ़राज़, इसे जाया नां करनां
सीप से यूं मोती बरसना, मेरी नज़र से देखनां तुम

मेरे पहलू में आकर भी  यारों, वो मेरी ना बन सकी
लकीरों का हाथों से मिट जाना, मेरी नज़र से देखना तुम
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Friday, August 16, 2013

तुझ्याशीच तुला मागायचं होतं

तुला बरचं काही सांगायचं होतं
खरंतर तुझ्याशीच तुला मागायचं होतं
तू जवळ असली, की...........
सर्व काही विसरायला होतं
मग.......
तुझ्याशी बोलणं, तुला बरचं काही सांगणं
राहुन जातं.....
जसं तू जवळ नसतानां,
पापण्‍यांतून पाणी वाहून जातं |
हल्‍ली.....
तुझ्याशी बोलायला, शब्‍दच सुचत नाहीं
तुझ्या शिवाय तनां-मनांत, कोणी सुध्‍दा उरत नाहीं
मनाला एक वेगळीच, हुर-हुर......
की....... तुझं मनं माझ्या साठी झुरत नाहीं
मलां सगळं कळतयं गं,
पण मनं तरीही वळणार नाही,
अंतर हे आपल्या मधले,
कधी सुध्‍दा गळणार नाहीं...............
जगात चाली-रिती बदलल्‍यात, पण......
घरच्‍यांना, पटनार नाहींत,
तुझीच हाईल दशा, मग....
जात्‍यातील धान्‍यां सारखी, पण मी आता ठरवलंय,
आपल्‍या स्‍वप्‍नांना अडवलंय, फक्‍त एकदा...........
एकदाच...................
तुला भेटायचं होतं.................
तुला बरचं काही सांगायचं होतं
खरंतर.................. तुझ्याशीच तुला मागायचं होतं
खरंतर................तुझ्याशीच तुला मागायचं होतं
राहुल उज्‍जैनकर ‘फ़राज़’

आजाना किसी रोज, वक्‍त मिले तो....


आजाना किसी रोज, मज़ारे इश्‍क पर , वक्‍त मिले तो
बडी मुद्दत से तम्‍मना है, तुझे देखने की वक्‍त मिले तो

तेरी खुशी के लिये , ख़ाक हुआ हूं, इश्‍के इंम्तिहान में
इक दिया तो रौशन कर दिया करो, वक्‍त मिले तो

अब कहां उजाले तरे नूर के , कहां वो संदल सा बदन
दामन ही चढा जाना अपनां, किसी रोज,वक्‍त मिले तो

रोज जिसे दाना चुगाकर, भेज देती हो तुम, मेरे पास
उसे भी कर दो, आज़ाद किसी रोज, वक्‍त मिले तो

तुझ से बढ़कर तो, अब तेरे, आशिक पर प्‍यार आता है ‘फ़राज़’
रोज मिन्‍नतें करता है,तेरे दिल से निकल जाउं,‘वक्‍त मिले तो’
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

किनारों पर मिला करते थे

याद है.... 
हम तुम अक्‍सर
किनारों पर मिला करते थे
अपनें रिश्‍तों के, पैबंद 
वहीं सिला करते थे 
याद है..... 


तुम्‍हे हमेशा उंचे टिले पर 
बैठना पसंद था 
और मुझे........ 
नीचे बैठकर तुम्‍हारे पायल को, 
निहारते रहनां....
खो जाता था उस 
छम-छम के संगीत में 
गूंथ लेता था, तुमको, अपनें 
अनुराग के गीत में 
मगर.....
इक रोज, तुमनें........ 
 उंचा ओहदा पा लिया 
तुम शहर चली गयी 
मैं बस उम्‍मीदों के घौसलें, 
सम्‍हालता रहा.... 
पता ही नहीं चला, कब तुम... 
उम्‍मीदों के घौसलें से निकलकर, 
एक सपनां बन गयी 
हम तुम जो अक्‍सर.. 
किनारों पर मिला करते थे... जानें कब 
दो किनारे बन गये......... 
            दो किनारे बन गये......... 
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़ 


Saturday, August 10, 2013

हल्‍ली- वाट चुकलेले घरी परत वळतात कुठे

माझ्या मुक्‍या भावनां तुला कळतात कुठे

हल्‍ली, स्‍वप्‍नें पण यथार्थात घडतात कुठे


माझे अश्रु, डोळ्यात तुझ्या येणे शक्‍य नाही

हल्‍ली, दगडांना सुध्‍दा  पाझर फुटतात कुठे


तुझ्या जाता, कितीतरी वर्षे, वर्षां माघून निघून गेली

हल्‍ली, 'राहुल' सारखं, लोकं आठवणीं जपतात कुठे


तुझ्या काळजीत, काळजाचा ठोका सुध्‍दा चुकतो

पण,हल्‍ली- वाट चुकलेले घरी परत वळतात कुठे

राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़