Sunday, July 17, 2011

MUJHE TUMSE PYAR HAI........PRIYE

MUJHE TUMSE PYAR HAI........
« »


MAIN TUMSE PYAR KARTA HUN,
NHI INKAAR KARTAA MANN IS SACHCHAIE SE,
NHI TO KYUN SAMNE AATA HAI
KEVAL TUMHARA HI AKSH ?

KYUN KHOJ LETI HAIN AANKHEN
HAJAARON KI BHID ME BHI TUMHE ?

KYUN MADHUR LAGTI HAI
SIRF TUMHARI HI AAWAZ ?

NINDO KO KYUN UDAA LE JATA HAI
TUMHARA EHSAAS ?

JAHAA SE TUM GUJRE
BADHTE HAIN PAG KYUN USI PATH KO ?

BADHTE HAIN HANTH KYUN
 BANDHNE KO TUMHARI HI AAGOSH ME ?

KYUN SAMAA JANA CHAHTA HAI MANN
 TUMHARI HAR SAANS ME ?

YAH MITHYA NHI 'SACH' HAI...
KI MAIN TUMSE PYAR KARTA HU !!!

KI MUJHE TUMSE PYAR HAI !!!

--
RAHUL UJJAINKAR
B-13, Atulanchal Parisar
Janki Nagar, Badi Ukhri
Jabalpur (M. P.)
INDIA. Mobile - +91998-160-1628

आग की भीख

आग की भीख

 

-रामधारी सिंह दिनकर

 

धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा

कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा

कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है

मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है

दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे

बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे

प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ

चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ

 

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है

कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है

मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?

यह नाश रहा है या सौभाग्य का सितारा?

आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा

भगवान, इस तरी को भरमा दे अँधेरा

तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ

ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ

 

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है

बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है

अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है

है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है

निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है

निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है

पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ

जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ

 

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है

अरमान आरजू की लाशें निकल रही हैं

भीगी खुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं

सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं

इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे

पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे

उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ

विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ

 

आँसू भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे

मेरे शमशान में श्रंगी जरा बजा दे

फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे

हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे

आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे

अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे

विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ

बेचैन जिन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ

 

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे

जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे

गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे

इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे

हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे

अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे

प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ

तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ/.



--
RAHUL UJJAINKAR
B-13, Atulanchal Parisar
Janki Nagar, Badi Ukhri
Jabalpur (M. P.)
INDIA. Mobile - +91998-160-1628

Saturday, July 16, 2011

कहते हैं तारे गाते हैं

कहते हैं तारे गाते हैं

कहते हैं तारे गाते हैं!
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!
कहते हैं तारे गाते हैं!

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथिवी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं!
कहते हैं तारे गाते हैं!

ऊपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं।
कहते हैं तारे गाते हैं!

- बच्चन



--
RAHUL UJJAINKAR
B-13, Atulanchal Parisar
Janki Nagar, Badi Ukhri
Jabalpur (M. P.)
INDIA. Mobile - +91998-160-1628

अँधेरे का दीपक

अँधेरे का दीपक

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था ,

भावना के हाथ से जिसमें वितानों को तना था,

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,

स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,

ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर कंकड़ों को

एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

बादलों के अश्रु से धोया गया नभनील नीलम

का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,

प्रथम उशा की किरण की लालिमासी लाल मदिरा

थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,

वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनो हथेली,

एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या घड़ी थी एक भी चिंता नहीं थी पास आई,

कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी छाई,

आँख से मस्ती झपकती, बातसे मस्ती टपकती,

थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,

वह गई तो ले गई उल्लास के आधार माना,

पर अथिरता पर समय की मुसकुराना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिसमें राग जागा,

वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा,

एक अंतर से ध्वनित हो दूसरे में जो निरन्तर,

भर दिया अंबरअवनि को मत्तता के गीत गागा,

अन्त उनका हो गया तो मन बहलने के लिये ही,

ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय वे साथी कि चुम्बक लौहसे जो पास आए,

पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए,

दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर

एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए,

वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे,

खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,

कुछ आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना,

नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका,

किन्तु निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,

जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,

पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

- बच्चन


--
RAHUL UJJAINKAR
B-13, Atulanchal Parisar
Janki Nagar, Badi Ukhri
Jabalpur (M. P.)
INDIA. Mobile - +91998-160-1628