Thursday, January 24, 2013

आजाओ एक दर्द का जाम पिला दो मुझको


आजाओ एक दर्द का जाम पिला दो मुझको
दर्दे मोहब्‍बत का कोई इनाम दिला दो मुझको

कांच से नाजुक सपनें तेरी राहों में बिछा दूं
ये लो पत्‍‍थर, अपनां निशाना दिखा दो  मुझको
आजाओं एक दर्द का जाम पिला दो मुझको

अंधेरों से बहोत डरता है,मेरा मासूम सा दिल
ये लो घरौंदा मेरा,थोडी आग जला दो मुझको
आजाओं एक दर्द का जाम पिला दो मुझको

देखुं कितना जज्‍ब है इन रिसते हुए जख्‍मों में
ये लो थोडा  इन पर, नमक लगा दो मुझको
आजाओ एक दर्द का जाम पिला दो मुझको

सांसों की डोर थमी है फ़राज़, लफ्ज लफ्ज पिरोनें से
छिन लों ये कलम मेरे हाथों से खबर बना दो मुझको
आजाओ एक दर्द का जाम पिला दो मुझको
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Monday, January 21, 2013

सदियों से लम्‍बे दिन...


सर्द रातों की ठिठुरन में आज
अचानक ही, गुज़रे पलों की गर्माहट नें
दस्‍तक दे दी.....
आधी रात को दिल के बंद दरवाजों
के किवाड खोलनें में
बहोत वक्‍त लग गया....
मुद्दतों से बंद पडें थे
बहोत मोटी गर्द जम गयी थी
यादों की ....
किवाड खुलते ही, लगा जैसे
उसपार पतझड का मौसम
लौट आया है...
कितनी तपीश थी उसपार
उसके मेरे प्‍यार की
या फिर....
हमारें लफ्जों से निकलते अंगारों की
कितना चाहा के रोकलूं तुमको
बारीश बनकर
भिगो दूं तुम्‍हारा मन
अपनें प्‍यार की बूंदो से....
मगर हाथ जब तुमनें छुडा लिया
क्‍या करता....
तुम सही थी शायद....
कलम के सहारे, पेट नहीं भरता नां
कविताऐं मन को सुकून देती है
पेट को रोटी नहीं
महंगे परिधान, आराईश की चिजें
बिना इनके जिवन तो मिथ्‍या
सा है....
बहाव की रफ्तार से कश्तियां
अपनें अपनें किनारों से लग गयी...
मगर....
किवाड के इस तरफ फिर वक्‍त
क्‍यू रूका सा मालूम होता है
कैसे काट लिये मैंने
बिना बारीश, बिना पडझड के
सदियों से लम्‍बे दिन...
दो गज जगह भी कम नहीं होती
सदियों की गर्द को अपनें में समेटनें
के लिये....
मेरी मानों तो.....
यूं ही चली आया करो
हर साल, अपनें हाथों की तपीश लेकर
और ऐसे ही फेर दिया करो
अपना हाथ मेरी मज़ार पर
ताकी सर्दी की ठिठूरन का
ये एहसास खत्‍म होता रहे
साल दर साल....
साल दर साल.......
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Friday, January 18, 2013

मालूम तो है, हम तेरी बातों में आजाते है

तुम क्‍यों देनें लगे हो फरेब मुझे वादों के
मालूम तो है, हम तेरी बातों में आजाते है

वो जो इक पल को दिखा जाते हो हुस्‍न अपनां
कितनें सारे  ख्‍वॉब फिर, इन ऑंखों में आजाते है
तुम क्‍यों देनें लगे हो फरेब मुझे वादों के
मालूम तो है, हम तेरी बातों में आजाते है

इक कतरा तेरी ऑंखों से जो निकल गया कभी
जानें कितनें सैलाब फिर मेरी पलको पे आजाते है
तुम क्‍यों देनें लगे हो फरेब मुझे वादों के
मालूम तो है, हम तेरी बातों में आजाते है

इस कदर हावी है फ़राज़, तमन्‍ना तुझे पानें की
सुबहो शाम आप मेरी दुआओं में आजाते है
तुम क्‍यों देनें लगे हो फरेब मुझे वादों के
मालूम तो है, हम तेरी बातों में आजाते है
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़