Wednesday, November 21, 2012

हमारा एक होना जरूरी है

कसाब जैसी सोच को मसलना जरूरी है
वतन फ़रोशी की हवाओं का बदलना जरूरी है
काफिर तो करेगा वार,गर हममें फूट होगी
कश्‍मीर से कुमारी तक,हमारा एक होना जरूरी है
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Tuesday, November 20, 2012

एक सराय की मानिंद रही जिंदगी अपनी

तलाश में इक अदद तेरे सहारे की ....
हर किसी का हम सहारा बनते रहे.....
एक सराय की मानिंद रही जिंदगी अपनी
चंद रोज रूककर मुसाफिर,मंजिल पर बढते रहे
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

Monday, November 19, 2012

शेर के मरनें पर फ़राज़,फकत कुत्‍तों की उम्र लंबी होती है

सोचनें बस से कहां मिली जमानें में किसी को चाहत है
तेरे नाम में है मगर तुझसे नही यही शिकायत है
बुरी सोच का नतीजा बुरा आम  एक कहावत है
मर जाऐ तुम जैसे सरफिरे,तो सही राहत है
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़
(यह शेर नये उभरते हुए एक शायर को समर्पित है,
जिनका कहना है कि हर 'ठाकरे' को मरना है

हां यकिनन ये कडवा सच है कि सबको मरनां है
मगर सिर्फ 'ठाकरे' को ही ?
मुझे इसमें उनकी कुंठीत मानसिकता ही दृष्टिगोचर हो रही है ....... परिपक्‍वता की कमी है ......
)


पतलूनें गीली होती है जब शेर की दहाड बुलंद होती है
फतह वही हासिल करते है जिनके हाथ में कमंद होती है
काफिर तो ता उम्र करते है कोशिशे शेर को मिटानें की
शेर के मरनें पर फ़राज़,फकत कुत्‍तों की उम्र लंबी होती है
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

Sunday, November 11, 2012

फिर दिया इश्‍क का मैनें, तेरे वास्‍ते जला दिया

तेरी जफ़ा, तेरे ग़म, लो आज सारे भुला दिया
तेरी खुशी पर अरमान अपनें खाक में मिला दिया
उम्‍मीदें फिर से, मेरे दिल पर, दस्‍तकें देनें लगी
फिर दिया इश्‍क का मैनें, तेरे वास्‍ते जला दिया
       तेरी जफ़ा तेर ग़म....

तुम भी रहे मज़बूर दिल से,दिल से हम भी रहे
रूस्‍वा तुम भी हुए हमसे,ग़मगीन हम भी रहे
इश्‍क की फुलझडीयॉं अब, फिर से तिडतिडाऐंगी
फिर दिया इश्‍क का मैनें, तेरे वास्‍ते जला दिया
        तेरी जफ़ा तेर ग़म....

रंगे महफिल सजाने का तुम ने, जबसे मन बना लिया
हर इक रंग से, हमनें अपनां, दिलो-दिवार सजा लिया
वस्‍ले इंतिजार में फ़राज़', अब अंधेरों का डर नहीं
फिर दिया इश्‍का का मैनें, तेरे वास्‍ते जला दिया
        तेरी जफ़ा तेर ग़म....
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

Wednesday, November 07, 2012

प्‍यार को मेरे उसनें यारो हुक्‍का बना के रखा है

अपनीं गज़लों नज्‍़मों का हिस्‍सा बना के रखा है
जमानें के लिये मोहब्‍बत का किस्‍सा बना के रखा है
मेरे इश्‍क के नशे में हरपल गुडगुडाती रहती है
प्‍यार को मेरे उसनें यारो हुक्‍का बना के रखा है
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

आजकल वक्‍त मेरा साथ नहीं देता
खुद से बढ़कर,  कोई साथ नहीं देता
उम्रभर क्‍या निभाऐंगे वादे वफ़ा मुझसे
इक रात के लिये भी जो साथ नहीं देता
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज'

Friday, November 02, 2012

तुम ही कहो सज़ाऐ मोहब्‍बत का क्‍या हरजाना बाकी है ?

तुम ही कहो सज़ाऐ मोहब्‍बत का क्‍या हरजाना बाकी है
चश्‍में पुरनम से दिल का बस,लहू बरस जाना बाकी है

मेरे बुलाने पर तेरा दौड के आना याद आता है
उन यादों का इस दिलसे अभी,निकल जाना बाकी है
तुम ही कहो सज़ाऐ मोहब्‍बत का क्‍या हरजाना बाकी है

शर्त है तुम्‍हारी तो मिलने से परदा करूंगा, मगर
बाहों में तेरे होने के एहसास से,उबर जाना बाकी है
तुम ही कहो सज़ाऐ मोहब्‍बत का क्‍या हरजाना बाकी है

गैर के सपनें सजा लिये तुमनें,अब हाथों में अपनें
मेरे हाथों से मगर अरमानों का बिखर जाना बाकी है
तुम ही कहो सज़ाऐ मोहब्‍बत का क्‍या हरजाना बाकी है

चमन से जुदा होकर फूलों की,उम्र लंबी नही होती
फ़राज़े जिस्‍म से तेरी धडकनों का निकल जाना बाकी है
तुम ही कहो सज़ाऐ मोहब्‍बत का क्‍या हरजाना बाकी है
राहुल उज्जैनकर फ़राज़

तुम मेरी मोहब्‍बत को, समझ नहीं पायी
मेरे दर्द में तेरी आखें, बरस नहीं पायी
मै चिर भी देता ,पहाड़ों का सीना, मगर
शिरिन तुम इस फरहाद की, बन नही पायी
 राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़ 

मैं गज़ल गाउं तुम साज भी ना छेडो,ऐसा नही होता

शेर अर्ज है.....

तुम अकेली नही हो जो ये कमाल करती हो
एहले,गुलिस्‍तां को खबर है के तुम प्‍यार करती हो
                   गज़ल
वादे वफ़ा हो मगर इकरार ना हो, ऐसा नही होता
बहारे चमन हो और गुल ना खिले, ऐसा नही होता

ये माना के हिज्र की रातें है,और वस्‍ले इंतिजार,मगर
हिचकियां भी ना आये वक्‍त बेवक्‍त, ऐसा नही होता

कागज़ो पे उतार दिये हमनें इश्‍क के, फसानें अपनें
मैं गज़ल गाउं तुम साज भी ना छेडो,ऐसा नही होता

अज़ल से दुश्‍मन है ये दुनिया हम  इशकजादों की
जुल्‍में दरिया हो, फ़राज़ पार नां करे,ऐसा नही होता
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'