Wednesday, February 29, 2012

फिर अकेलापन गहराते जाना ......


लोगों का आना, जाना, फिर अकेलापन... गहराते जाना
उम्‍मीदों का चरम पर आकर, फिर सपनों का टुटते जाना
सिनें में दफन सारे राजों का यूं, आंसूओं से खुलते जाना
लोगो का आना , जाना , फिर अकेलापन गहराते जाना

बारीश के मौसम में वो भिगना, साथ दौडते जाना
गीली रेत पर चलना फिर, उससे ही घरोंदे बनाना
हाथों मे हाथ थामकर फिर देर तक बढते जाना
लोगो का आना , जाना , फिर अकेलापन गहराते जाना

मुद्दतों बाद मिलना फिर भी बस मुस्‍कुरा जाना
हाथ मिलाना मगर गले लगने से कतरा जाना
जिने मरने का वादा करनां निभाने से घबरा जाना
लोगो का आना , जाना , फिर अकेलापन गहराते जाना

Base line pickup from my Bst Frnd… Mrs. Abha ji….

 (Rahul Ujjainkar “Faraaz”)

अकेलापन फिर भी लगता है . . . . . . .


रोशनी है चारों और मगर, अंधेरा घना फिर भी लगता है

हर पल रहती हो तुम साथ मगर,अकेलापन फिरभी लगता है

कितनी ही बार पुलकित हुआ था तन-मन
अपलक निहारते थे जब हमारे दो नयन
हर बार ले आया जो स्‍वप्‍न से यथार्थ में
स्‍पर्श वो, अपरिचित मगर फिर भी लगता है
        हर पल रहती हो तुम साथ मगर

मौन जहॉं मुखर हो उठता है, स्‍वप्‍न जहॉं उडान पाते है
चलचित्र की भांति संचीत है जहॉं, भूत-यथार्थ और स्‍वप्‍न
कल्‍पना की धरा पर जहॉं, हमारे स्‍वप्‍न आकार पाते है
बधीर हुआ सा वो मस्तिष्‍क, मगर फिर भी लगता है
        हर पल रहती हो तुम साथ मगर

हर तरफ शोर है अति, हुडदंग भी असिमित
गुंज रही है स्‍वर-संगीत की स्‍वर लहरियां भी
मस्तिष्‍क तक जा रहे हैं, सभी स्‍वर-तरंगे भी
लेकिन, कानों मे बहरापन फिर भी लगता है
        हर पल रहती हो तुम साथ मगर
 
क्‍यू हमने पंछी की तरह चहकना छोड दिया
क्‍यूं हमनें फूलो की तरह महकना छोड दिया
क्‍यूं अब स्‍वप्‍न हमारे एक दुजे के रहते नहीं
क्‍यूं अब आंसू तुम्‍हारे मेरी ऑंखो से बहते नहीं
इक घौसले के दो पंछी में अंजानापन सा लगता है
        हर पल रहती हो तुम साथ मगर

हम वाणी में ओज लिये, अंग-अंग में जोश लिये
जिव्‍हा के तरकश में हम, तानों के क्‍यूं बाण लिये
क्षण-क्षण एक दुजे को, निस-दिन मर्माहत करनां
कहो ‘’फराज’’, भला जिवन क्‍या ऐसे सजता है
        हर पल रहती हो तुम साथ मगर
        अकेलापन फिर भी लगता है
 राहुल उज्‍जैनकर ''फराज'' 

Monday, February 27, 2012

सांझ गारवा क्रमशः

सांझ गारवा - अंश क्रमांक 5 (संध्‍याकाळचा पाउस मला गाणं गायला सांगायचा)






सांझ गारवा - अंश क्रमांक 6 (तू विसरू शकणार नाहीस)






सांझ गारवा - अंश क्रमांक 7 (आठवतय ?)



सांझ गारवा

सांझ गारवा - अंश क्रमांक 1 (संध्‍याकाळ जवळ आली की माझ असं होतं)









सांझ गारवा - अंश क्रमांक 2 (सळसळणारा वारा अन सोन पिवळया रानात)









सांझ गारवा - अंश क्रमांक 3 ( आता तुला सगळं जुनं आठवेल की नाही कुणास ठाउक )









सांझ गारवा - अंश क्रमांक 4
अशीच यावी वेळ एकदा, स्‍वप्‍नी देखील नसताना
असेच घडावे अवचित काही, तुझया समीप मी असताना

अश्‍याच एका संध्‍याकाळी, एकांताची वेळ अचानक
जवळ नसावे चिटट पाखरू, केवळ तुझी नी माझी जवळीक

संकोचाचे रेशीम पर्दे, हा हा म्‍हणता विरून जावे
समय सरावा मंद गतीने, अन प्रितीचे सूर जुळावे

मी मागवे तुझिया पाशी, असे काहीसे निघताना
उगीच करावे नको नको तू, हवे हवे से असताना

शब्‍दावाचून तूला कळावे, गूज मनी या लपलेले
मुक्‍त पणी तू उधळून द्यावे, जन्‍म भरीचे जपलेले ......
(सांझ गारवा यां सीडी मधील कवितेचा अंश)





Sunday, February 26, 2012

मधली सुटटी


Madhali Sutti By : Salil Kulkarnii All Parts of First Episode





Must Watch.............





Saturday, February 25, 2012

विविध प्रकार चे ध्‍वनिफित व ध्‍वनिचित्रफित

Aap yu, faasalon se guzar te rahe......
Very Nice Song..........Must Listen.












Aarya Ujjainkar's.................. Welcome speech practice .



Aarya Ujjainkar's.................. Welcome speech Final .

Place: Blooming Flower Public School, Jabalpur
Class: KG-Senior
Age: 4yrs.



Madhali Sutti is a show designed to touch the hearts of everyone who once went to school kids, teenagers, youngsters, the elderly as they travel down the mem...


(By: Salil Kulkarnii......)