Sunday, April 07, 2013

ये जो रंग लगाया करती हो


ये जो तुम गैरो में बैठकर, मुस्‍कुराया करती हो
नाहक  ही  तुम  अपनां,   हुनर  जाया  करती हो.....

है तमन्‍ना  मुझसे  मिलनें की,  तो  मेरी  अंजुमन में आ
ये क्‍यों हर शाम कबूतरों को, दाना खिलाया करती हो

नज़रों के लडाओं पेंच , अब तो  बहारों  के दिन है
ये  क्‍या  बच्‍चों  जैसी, तुम  पतंग उडाया करती हो

दिल में आना चाहो तो , दिल का दरवाजा भी खुला है
ये क्‍यों  खि‍डकियों  से तुम, तांका - झांका  करती हो 

हर बार गहरा - चटक होता है , जब भी तुम्‍हे देखा है
अपनें नाखूनों पर तुम ,  ये जो रंग लगाया करती हो

बाद  इसके  मुझपर  कोई , नशा फिर तारी नहीं होता
'फ़राज़' की गज़ल जब  तुम , तरन्‍नुम में गाया करती हो
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

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