Tuesday, April 30, 2013

तुम्हे वो सब याद भी है या नहीं

तुम तो भूल गयी
उतार कर मेरे प्यार की निशानी
और.......
मुझे मेरे ही मोबाईल में
कर लिया था, कैद
तस्वीर उतार कर.....
रजनी गंधा के फूलों का
वो गुलदस्ता....
छोड आया था
तुम्हारे घर के कोनें में.....
जहा गुथी थी उंगलिया
हमारी......
बारीश का वो दिन.....
अब भी याद है ....
उन फूलों की महक
आज भी ताजा मालूम देती है,
पता नहीं.....
तुम्हे वो सब याद भी है, या नहीं.......
राहुल उज्जैनकर फ़राज़

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