Saturday, April 06, 2013

जख्‍म़े दिल फिर हरा हो रहा है, इन दिनों


जख्‍म़े दिल फिर हरा हो रहा है, इन दिनों
चल रहा है पतझड का मौसम, इन दिनों

सुना था के मिल जाते है, बिछडे हुए अक्‍सर फिर राहों पर
बांट में तकता रहा उम्र भर, जिनकी उसी दो राहे पर
अब, मुझे वो आवाज़ दे रहा है, इन दिनों..............
        जख्‍में दिल.......
बंदीशे थी मेरे प्‍यार की, उसे उडान भरनां था
सैयाद की दुनिया में उसे नया  रंग भरनां था
हो रहा है उसे परों का एहसास इन दिनों
        जख्‍में दिल.......
लग जाती थी सिने से जब बिजली चमकती थी
होती बहोत थी नाराज़ जब घर की छत  टपकती थी
हो रहा 'फ़राज़' उसे बूंदों का एहसास इन दिनों
        जख्‍में दिल.......
राहुल उज्जैनकर फ़राज़

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