Sunday, July 10, 2011

आओ कि कोई ख्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के सन्गीन दौर की

डस लेगी जान-ओ-दिल को कुच्छ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीन ख्वाब बुन सके

गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र
ख्वाबो के आसरे पे कटी है तमाम उम्र

ज़ुल्फ़ों के ख्वाब, होठों के ख्वाब, और बदन के ख्वाब
मिराज-ए-फ़न के ख्वाब, कमाल-ए-सुखन के ख्वाब

तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग-ए-वतन के ख्वाब
ज़िन्दां के ख्वाब, कूंचा-ए-दार-ओ-रसन के ख्वाब

ये ख्वाब ही तो अपनी जवानीइ के पास थे
ये ख्वाब ही तो अपने अमल के असास थे

ये ख्वाब मर गये हैं तो बे-रन्ग है हयात
यूं है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग है हयात

आओ कि कोई ख्वाब बुने कल के वास्ते
वरना ये रात आज के सन्गीन दौर की

डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीन ख्वाब बुन सके

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अहले-दिल और भी है अहले-वफ़ा और भी है
एक हम ही नही दुनिया से खफ़ा और भी है

क्या हुआ गर मेरे यारो की ज़बाने चुप है
मेरे शाहिद मेरे यारो के सिवा और भी है

हम पे ही खतम नही मसलक-ए-शोरीदा-सरी
चाक-ए-दिल और भी है चाक-ए-कबा और भी है

सर सलामत है तो क्या सन्ग-ए-मलामत की कमी
जान बाकी है तो पैकान-ए-कज़ा और भी है

मुन्सिफ़-ए-शहर की वहादत पे ना हर्फ़ आ जाये
लोग कहते है "फ़राज़" के अरबाब-ए-जफ़ा और भी है
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लब पे पाबन्दी नही एहसास पे पहरा तो है
फिर भी अहल-ए-दिल को अहवाल-ए-बशर कहना तो है

अपनीइ गैरत बेच डालें अपना मसलाक छोड दें
रहनुमाओं मे भी कुच्ह लोगो को ये मन्शा तो है

है जिन्हे सब से ज़्यादा दावा-ए-हुब्ब-ए-वतन
आज उन की वजह से हुब्ब-ए-वतन रुसवा तो है

बुझ रहे हैं एक एक कर के अकीकदों के दिये
इस अन्धेरे का भी लेकिन सामना करना तो है

झुठ क्यू बोलें फ़रोग-ए-मस्लहत के नाम पर
ज़िन्दगी प्यारी सही लेकिन हमे मरना तो है

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