Sunday, July 10, 2011

तुम कितना भी चाहो, तुम्हे वो कल ना मिलेगा!

ये पल पल क चलना, फ़ासिला खतम ना करेगा,
तुम कितना भी चाहो, तुम्हे वो कल ना मिलेगा!

ये कोई गाता है, या नमाज़ पढता है,
तुम कितना भी चाहो, तुम्हे एक ही खुदा मिलेगा!

ये गुज़रती हुई रात है, या निकलती हुई सहर,
तुम कितना भी चाहो, तुम्हे हमसफ़र ना मिलेगा!

ये बारीश की बून्दे है, या आंखो के आंसू,
तुम कितना भी चाहो, इन्हे थामने वला ना मिलेग!

ते दिल के तुकदे है, या आप कि यादे,
तुम कित्ना भी चाहो, तुम्हे मरहम ना मिलेगा!

येह दिल में अरमान है या सुलगते हुए शोले,
तुम कितना भी चाहो, तुम्हे सेहरा मे पानी ना मिलेगा!

ये कैसी उलझन बन गयी है, दिल कि धडकन,
तुम कितना भी चाहो, तुम्हे सुकून ना मिलेगा!

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