Sunday, April 01, 2012

मरे सब्र की सीमा अब गुजर गई लगती है

मरे सब्र की सीमा अब गुजर गई लगती है
बात अब हद से आगे गुजर गई लगती है

जाने किस बात पर गुमांन है तुझे जानें नाज है किसपर
राजपाट है किस के दमपर, और सर ताज है किसपर
खामोश रहता हूं बाहर से ,मगर अंदर जलजला सा है
समेट कर रखी जो चिंगारी अग बिखर गयी लगती है
                         मेरे सब्र की सीमा अब गुजर गई लगती है

दौलत के गुरूर पर नहीं , प्‍यार पर गुजारा करतें है
खुदगर्जी के दौर में भी यारों खुद्दारी पर गुजारा करते है
मर्म को मेरे समझते तो,यूं मर्माहत ना होता 'फराज'
टीस अब मन में नफरत की यारों ,उतर गयी लगती है
                         मेरे सब्र की सीमा अब गुजर गयी लगती है
राहुल उज्‍जैनकर 'फराज'

(उन सभी मित्रों को समर्पित जिन्‍होंने अबतक मेरे सब्र की परीक्षा ली है .......... अब बस्‍स !! )

No comments:

Post a Comment