Thursday, July 01, 2010

सपनों में ही जिनें वाला मन.......

सपनों में ही जिनें वाला मन.......

मिलने कि आस मे तरसता हुआ मन
सपने संजोता आंखो से बरसता हुआ मन
कभी धुप कभी छांव को सहता हुआ मन
पांव के छालो सा रिसता हुआ मन

तनहाईयों मे खुशियो के मेले लगता मन
मिलन कि आरजु मे उसके घर के फेरे लगता मन
चेहरे पर ना जाने क्युं, चेहरे लगाता मन
इक उसी को पाने खातीर गमों को गले लगता मन


रुह को उसके आने की आहट सुनाने वाला मन
खुली बंद आंखो से निहारते रहने वाला मन
पलों के इंतिजार को सदियां कहनें वाल मन
हर पल इक नयी गज़ल गुनगुनानें वाला मन

अश्कों से गमों का दामन भिगोनें वाल मन
तेरे अनकहे सवालों क जवाब खोजनें वाला मन
तेरे ज़ानों मे ता उम्र की खुशी चाहनें वाला मन
गर है ये सपनां "फ़ारज़" तो सपनों में ही जिनें वाला मन
सपनों में ही जिनें वाला मन.......

राहुल उज्जैनकर "फ़राज़"

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