Monday, September 20, 2010

Poetry (my own)

ये रात कब खत्म होगी ?
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आज तुम्हारी सहमति मिली और मेरा मन अब मेरे काबू मे कहां उसने तो हवाओं का हाथ, थामकर छोटी-छोटी तितलियों का रुप धरा है.. और मेरी आंखो के सामने कितने ही, सलोने ख्वाब संजोये है ! तुम्हारा वो स्पर्श.... वो तुम्हारी बोलती आंखे.... वो अनकही बातें . . . लगता है जैसे, तुम सचमुच कह रही हो मुझे अब भी, बागों की माटी में तुम्हारे कदमों के निशान... साफ़ नज़र आ रहें है ! वो माटी भी, जैसे किन्ही खयालों मे खोगयी थी.. मानों उसकी भी मुरादें पूरी हो गयी हों मगर........ अपनी मुरादें कब पूरी होंगी ? दुनिया के निष्ठुर हांथ... अपनें अरमानों को कुचल तो नहीं देंगे ? ऐसे कितनें ही सवाल... मुझे सताते रहते हैं ! और आखीर कितनी देर ? ये रात बाकी रहेगी . . . . ये क्या ? . . . . . अभी सिर्फ़ आठ ही बजे हैं ? ..... मगर ऐसा लगता है ! जैसे ना जाने कितानी सदियां बीत गयी है! अभी १२ घंटे बाकी है, अपने मिलन को मगर ये दिल ... यही सोच रहा है..... ये रात कब खत्म होगी ? ...... ये रात कब खत्म होगी ? ...... =============== राहुल उज्जैनकर "फ़राज़

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