Thursday, July 26, 2012

सचमुच सपनां सा लगता है वो सब


कितना कुछ हुआ मेरे साथ....
तुम्‍हारे साथ...
कितना कुछ सोच लेते है हम
परिणामों की चिंता किये बगैर
तो कभी...
परिणामों के साथ
तुम्‍हारी तो आदत थी
हमेशा, डरते रहनें की
और मेरी ?
डराते रहनें की ....शायद....
कितना कुछ सहा तुमनें
कहा तुमनें
मेरे प्रेम के लिये.... अपनें प्रेम के लिये
आज सोचता हूं...
तो सचमुच
सचमुच सपनां सा लगता है.......

आने वाले समय से डरते हुए

एक दुसरे को तसल्‍ली देते थे
लेकिन...........
कहीं दूर तक बिछडनें के डर से डरते हुए
कैसा खेल था, तकदीर का
कितनी तन्‍हा थी तुम,वहॉं...
अपनों ही के बीच, अजनबीं की तरह
और.....मैं ?
अपनें साथ सबका समर्थन लिये हुए....
कैसे गुजरा होगा तुम्‍हारा वक्‍त ?
अजनबी बननां, अपनें ही लोगों में........
आज सोचना हूं तो सचमुच..
सचमुच सपनां सा लगता है.....

पता नहीं हमनें कितनें संबंध..
बनाये है , या कितने बिगाडे है
मगर एक बात जो मुझे लगती है...
वो ये .....
कि....
हमनें अपनें वादे निभाये है
एक दुसरे से किये वादे
एक दुसरे के लिये किये वादे....
आज सोचता हूं न... 'फ़राज़'.....
तो सचमुच....सचमुच
एक सपनां सा लगता है..
सपनां सा लगता है !!

राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

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