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Tuesday, November 25, 2014

गैजेट्स कविता (आधुनिक कविता)

वो रोज छत की मुंडेर से शिकार करती है ।
अपनी नज़रों को, तीर की तरह इस्तेमाल करती है ।
जो भी डूबा उसकी आँखों में, फिर उबर न पाया ।
अपनी आँखों को, समंदर की तरह इस्तेमाल करती है ।

आज के दौर में तो , जुदाई भी जुदाई नही लगती ।
sms को भी ख़त की तरह, इस्तेमाल करती है ।
दूरियाँ मीलों की भी हो ,तो कम है उसके लिए ।
रूबरू मुझसे होने को, स्काइप का इस्तेमाल करती है ।

उसकी हर अदा में भी इक नशा है, फ़राज़
अपनें लबों को, जाम की तरह इस्तेमाल करती है ।
जहां भी जाऊ , उसे हर पल की खबर रहती है ।
मुझे ट्रैक करने वो Gps का इस्तेमाल करती है ।
©®राहुल फ़राज़

कण कण में है ईश्वर, मुझे पता है....

कण कण में है ईश्वर मुझे पता है ।
पञ्च तत्त्व में है ईश्वर मुझे पता है ।
चेतन की अवस्था में है कल्पनायें ।
चेतन की अवस्था में है संवेदनाये ।
जिव्हा में है शूल, चेतनावस्था में ।
मांगता है हर कोई प्रमाण,चेतनावस्था में ।
अचेतावस्था में बन जाते हो शून्य मगर ।
वो फिर भी भरता है श्वास अचेतावस्था में
हर प्राणी मात्र में है ईश्वर हर अवस्था में ।
मुझे पता है ।।
मुझे पता है ।।
©®राहुल फ़राज़ —

Tuesday, February 04, 2014

कौन था वो

कौन था वो
जो जिवन में कुछ आयाम जोड गया
लेकर आया था नयी सुबह
नये रिश्‍तों की नयी धुप
अद्भुत और अलौकिक खुब
कुछ पलों को आकाश में जो
स्‍मृतियों के पक्षी छोड गया
कौन था वो.......


.............................कौन था वो......
जिसका मैं अनुभव भी न कर पाया पूर्ण
वाणी का वो मीठापन
वो स्‍पर्श वो अपनापन
चिरस्‍थायी हो गये, अंतर्मन में
शैशव काल के , ये निरव क्षण
संपूर्ण क्षण अपनें जिवन के
देकर भी जो........
कर गया मुझको अपूर्ण....... कौन था वो
...... कौन था वो...... कौन था वो
©राहुल उज्‍जैकनर फ़राज़

Wednesday, December 11, 2013

गुडिया बस् मेरी दिवानी है

जैसे कोई सपनां देख रही हूं शायद...तुम्‍हारा
कितनी सहज मुस्‍कान...
अचानक से रोना
अपनें में ही हंसना
मैं सामनें हूं...... फिर भी
जाने किस से...... बांते करती रहती हो
जब, मन करता है, तुम्‍हारे साथ खेलनें का
तो, सोती रहती हो....
मैं भी नां....
जानें क्‍या क्‍या सोचनें लगी हूं
दिन ही कितनें हुए है तुमको आए......
मगर.....
एक अंजाना यथार्थ, मुझे सतानें लगता है
जब भी खना बनाती हूं नां...
तो, ज्‍यादा डर जाती हूं
हल्‍दी जब हाथों में, लेती हूं.....
एक पल को भी आंसू नहीं थमते
मगर.....
अब सोच लिया है
इतना दूर तक नहीं सोचूंगी
तुम्‍हारी तरह, निश्‍चल बनके
तुम्‍हारे साथ रहूंगी
अभी तो....
कितनी सारी लोरीयां गानी है
कितनें किससे, कहानियां सुनानीं है
जानती हूं..... मैं
सब हैं दिवानें मेरी गुडिया के
और...... गुडिया बस्
मेरी दिवानी है
................ गुडिया बस्
मेरी दिवानी है

कल्‍पना एवं संवाद -
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Friday, August 16, 2013

किनारों पर मिला करते थे

याद है.... 
हम तुम अक्‍सर
किनारों पर मिला करते थे
अपनें रिश्‍तों के, पैबंद 
वहीं सिला करते थे 
याद है..... 


तुम्‍हे हमेशा उंचे टिले पर 
बैठना पसंद था 
और मुझे........ 
नीचे बैठकर तुम्‍हारे पायल को, 
निहारते रहनां....
खो जाता था उस 
छम-छम के संगीत में 
गूंथ लेता था, तुमको, अपनें 
अनुराग के गीत में 
मगर.....
इक रोज, तुमनें........ 
 उंचा ओहदा पा लिया 
तुम शहर चली गयी 
मैं बस उम्‍मीदों के घौसलें, 
सम्‍हालता रहा.... 
पता ही नहीं चला, कब तुम... 
उम्‍मीदों के घौसलें से निकलकर, 
एक सपनां बन गयी 
हम तुम जो अक्‍सर.. 
किनारों पर मिला करते थे... जानें कब 
दो किनारे बन गये......... 
            दो किनारे बन गये......... 
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़ 


Tuesday, July 09, 2013

आ भी जाओं....



बहोत दिन हो गये
तुमसे बात नहीं हुई
तारे जो गिनता रहता हूं
आजकल
सपनों को भी पता नही
क्‍या हो गया है
सब कुछ काला सा नज़र आता है
शायद, रंग उड गया है इनका भी
अपनें प्‍यार की तरह
अंधेरा ही नज़र आता है
हर तरफ
उम्र के साथ......
आंखों की चमक भी तो
कमज़ोर हो गयी है
सुनों, याद बनके....
तुम जब भी आ जाती हो नां
बडे सुकुन से समय गुज़र जाता है

जब, तुम मेरी तस्‍वीर से
ये गर्द झाडनें आती हो नां
तभी तुमको ठीक से देख पाता हूं
अब तुम्‍हारी भी कमर झुक गयी है
कितनें दिन ?
यूं, अपनों में गैरों की तरह रहोगी .....
मेरी टुटी कुर्सी पर
टुटे हुए रिश्‍तों का बोझ
लेकर बेकार बैठी रहती हो
आजाओ अब.....
साथ मिलकर , हर सफ़ा अतित का
वापस पलटेंगे.....
और फिर पहुंचेगे उस सफ़े तक
जिस सफ़े पर , तुमसे पहली मुलाकात हुई थी
आजाओ अब......
बस्, आ भी जाओं....
आ भी जाओ.....
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Tuesday, April 30, 2013

तुम्हे वो सब याद भी है या नहीं

तुम तो भूल गयी
उतार कर मेरे प्यार की निशानी
और.......
मुझे मेरे ही मोबाईल में
कर लिया था, कैद
तस्वीर उतार कर.....
रजनी गंधा के फूलों का
वो गुलदस्ता....
छोड आया था
तुम्हारे घर के कोनें में.....
जहा गुथी थी उंगलिया
हमारी......
बारीश का वो दिन.....
अब भी याद है ....
उन फूलों की महक
आज भी ताजा मालूम देती है,
पता नहीं.....
तुम्हे वो सब याद भी है, या नहीं.......
राहुल उज्जैनकर फ़राज़

Sunday, February 17, 2013

मगर अभी रात ढलनें को है....

सोचता हूं छोड दूं तेरा दर तेरी गली
तेरी मूरत जो, संगमरमरी सांचे में ढली
तेरे हुस्‍न के नज़ारे अभी परवान चढनें को है
        मगर अभी रात ढलनें को है...........

कुछ वक्‍त के तकाजे है, कुछ इरादे दिल के
बहोत है बाकी सुनाने को, फसानें दिल के
दिल के मरहले कहॉं,खत्‍म होने को है
         मगर अभी रात ढलनें को है.............
                            मगर अभी रात ढलनें को है.............
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़ 


Friday, February 15, 2013

बहोत कुछ, अभी समेटना बाकी है


चल पडो,  की अभी..... 

बहोत कुछ, समेटना बाकी है
अपनें हिस्‍से की पूरी धूप
अभी काटना बाकी है
इश्‍क का चांद अभी
रखूं भी तो, कहां रखूं ?
छत से अपनें हिस्‍से की
अभी, अमावस....
समेटना बाकी है
तुम कहती हो......
सहारे इश्‍क के
जिंदगी गुज़ार दूंगी
रस्‍मों रिवाज़ो के सारे
बंधन उतार दूंगी
तुम्‍हे भी तो अभी.....
देना, इंम्तिहान बाकी है
चल पडो़..... की
अभी बहोत कुछ
समेटना बाकी है
अपनें हिस्‍से की
पूरी धूप अभी.....
काटना बाकी है......
चल पडो़............. बहोत कुछ अभी समेटना बाकी है
 बहोत कुछ अभी समेटना बाकी है
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़ 

Monday, January 21, 2013

सदियों से लम्‍बे दिन...


सर्द रातों की ठिठुरन में आज
अचानक ही, गुज़रे पलों की गर्माहट नें
दस्‍तक दे दी.....
आधी रात को दिल के बंद दरवाजों
के किवाड खोलनें में
बहोत वक्‍त लग गया....
मुद्दतों से बंद पडें थे
बहोत मोटी गर्द जम गयी थी
यादों की ....
किवाड खुलते ही, लगा जैसे
उसपार पतझड का मौसम
लौट आया है...
कितनी तपीश थी उसपार
उसके मेरे प्‍यार की
या फिर....
हमारें लफ्जों से निकलते अंगारों की
कितना चाहा के रोकलूं तुमको
बारीश बनकर
भिगो दूं तुम्‍हारा मन
अपनें प्‍यार की बूंदो से....
मगर हाथ जब तुमनें छुडा लिया
क्‍या करता....
तुम सही थी शायद....
कलम के सहारे, पेट नहीं भरता नां
कविताऐं मन को सुकून देती है
पेट को रोटी नहीं
महंगे परिधान, आराईश की चिजें
बिना इनके जिवन तो मिथ्‍या
सा है....
बहाव की रफ्तार से कश्तियां
अपनें अपनें किनारों से लग गयी...
मगर....
किवाड के इस तरफ फिर वक्‍त
क्‍यू रूका सा मालूम होता है
कैसे काट लिये मैंने
बिना बारीश, बिना पडझड के
सदियों से लम्‍बे दिन...
दो गज जगह भी कम नहीं होती
सदियों की गर्द को अपनें में समेटनें
के लिये....
मेरी मानों तो.....
यूं ही चली आया करो
हर साल, अपनें हाथों की तपीश लेकर
और ऐसे ही फेर दिया करो
अपना हाथ मेरी मज़ार पर
ताकी सर्दी की ठिठूरन का
ये एहसास खत्‍म होता रहे
साल दर साल....
साल दर साल.......
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Saturday, December 15, 2012

भूलता जा रहा हूं सब


भूलता जा रहा हूं सब
अपनें अतित के पन्‍ने
दिनों पहले सहेज कर
रख दिये थे कहीं.....मैंने...
अचानक से मिल गये कुछ....
हर इक सफे पर
हर एक लफ्ज
अब भी ताजा मालूम देता है.......
खेत की सरहद पर लगी
इमली की तरह
हलक से उतर कर
दिमाग को सुकुन देती.....
बारीश के मौसम में
तुम्‍हारे आंचल की छत जैसा
अरसा हो गया....
बारीश में भिगे...
ठिठुरते हाथों में
चाय की प्‍याली थामें....
और भी बहोत से पन्‍ने थे
मगर.....
भूलता जा रहा हूं सब.....
    भूलता जा रहा हूं सब.....
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

क्‍या ये जरूरी है.....?


क्‍या ये जरूरी है ?
मेरे ही बीज से बने वो
मेरे ही रूप रंग में ढले वो
क्‍या ये जरूरी है.....?
फिर हमारे रक्‍त संबंधों का क्‍या
सब मिथ्‍या है
कोई मोल नहीं इसका
फिर भी साथ रहना....
क्‍या ये जरूरी है.....?
हमारा कुनबा, हमारा खानदान
सिर्फ खोखले शब्‍द है
या किसी स्‍वार्थ की डोर से बंधे
जिने को मजबूर
क्‍या ये जरूरी है......?
मेरे बीज से ना होना
सब संबंधो का मिथ्‍या होना है
अलावा इसके
क्‍या अलग है हम ?
संवेदना, प्रेम, दुःख
अश्रुओं का खारापन
क्‍या अलग है ?
इन सबको नज़र अंदाज करना
क्‍या ये जरूरी है......?
 क्‍या ये जरूरी है......?
राहुल उज्‍जैनकर फ़राज़

Sunday, December 02, 2012

मैं मौन क्‍यों हो जाता हूं ?

मैं मौन क्‍यों रह जाता हूं

इतने कष्‍ट, संताप तुम्‍हारे
सारे क्‍युं मै सहता हूं.....
ठुकराती हो तुम हर बार
मगर....
खामोश खडा रह जाता हूं
ऑखों में लाकर आंसु
जब....
मुझसे लिपट तुम जाती हो
उस एक पल में मैं
स्‍वयं कुबेर हो जाता हूं...
अब समझी ?
अक्‍सर,मैं मौन क्‍यों हो जाता हूं.....

नैनों से छुप नहीं पाता
मृदुल और अलौकिक नेह
गौण हो जाती है
अपनें बीच
नश्‍वर और मतवाली देह
घटा बनकर बरसती हो
जब तुम......
मैं मयुर बन जाता हूं
अब समझी ?
अक्‍सर मैं मौन क्‍यों हो जाता हूं.........

कभी रौद्र कभी संयम में
रहती अल्‍हड नदी सी तुम
कलरव का होता आभास
कभी...
कभी... झंकार पायल की
बहती रहती अविरत ..निश्‍चल
कभी..
कभी, तान सुनाती कोयल की
तुम्‍हारे मिलन की चाह में,मैं
सागर गहरा बन जाता हूं
अब समझी ?
अक्‍सर, मैं मौंन क्‍युं हो जाता हूं

प्रेम की परिभाषा हो तुम
भक्ति में डूबी गाथा
छल-कपट हर द्वेश सहती
मगर.....
टुट ना पाता, तेरा मेरा नाता
मीरा जब तुम बन जाती हो
मैं तब श्‍याम हो जाता हूं
अब समझी ?
अक्‍सर, मैं मौन क्‍यूं हो जाता हूं
          मैं मौन क्‍यूं हो जाता हूं
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़' 

Saturday, December 01, 2012

कितनी जल्‍दी सबकुछ खत्‍म हो गया

कितनी जल्‍दी, सबकुछ अचानक से
खत्‍म हो गया
मेरे हृदय का कृंदन
तुम्‍हारे 
गुंज में शहनाई की
लुप्‍त हो गया
तुम सुनती भी कैसे ?
इतनें कोलाहल में
मेरे स्‍वप्‍नों का
टुटकर बिखर जाना

कितनीं सादगी से
तुमनें
अपनें हाथों में मेहंदी
रचाली
ऑंखों से बहते मेरे
हृदय रक्‍त को
सहेज कर

व्‍यर्थ ही तो जायेंगे अब
मेरे अरमानों के ये
पंख सारे
ले लो इन्‍हे......
अपनें नये घौंसले में
सजा लेना...
एक नयी दुनिया अपनी
बसा लेना...

तीव्र है अभी ज्‍वाला
जलती हुई आशाओं की...
तप्‍त है भावनाऐं
स्‍वाहा होने को आतुर..

प्रत्‍येक स्‍वप्‍न,प्रत्‍येक क्षण
चुंबन - आलिंगन के वो
निरव क्षण...
भस्‍म होने को लालायित है
उठ रही है जबतक..
उंची ये लौ..
फेरे सात लगा लो तुम
फिर करके सदा को..
विस्‍मृत मुझे......
सेज-सुहाग की सजा लो तुम
     सेज-सुहाग की सजा लो तुम
राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

Thursday, July 26, 2012

सचमुच सपनां सा लगता है वो सब


कितना कुछ हुआ मेरे साथ....
तुम्‍हारे साथ...
कितना कुछ सोच लेते है हम
परिणामों की चिंता किये बगैर
तो कभी...
परिणामों के साथ
तुम्‍हारी तो आदत थी
हमेशा, डरते रहनें की
और मेरी ?
डराते रहनें की ....शायद....
कितना कुछ सहा तुमनें
कहा तुमनें
मेरे प्रेम के लिये.... अपनें प्रेम के लिये
आज सोचता हूं...
तो सचमुच
सचमुच सपनां सा लगता है.......

आने वाले समय से डरते हुए

एक दुसरे को तसल्‍ली देते थे
लेकिन...........
कहीं दूर तक बिछडनें के डर से डरते हुए
कैसा खेल था, तकदीर का
कितनी तन्‍हा थी तुम,वहॉं...
अपनों ही के बीच, अजनबीं की तरह
और.....मैं ?
अपनें साथ सबका समर्थन लिये हुए....
कैसे गुजरा होगा तुम्‍हारा वक्‍त ?
अजनबी बननां, अपनें ही लोगों में........
आज सोचना हूं तो सचमुच..
सचमुच सपनां सा लगता है.....

पता नहीं हमनें कितनें संबंध..
बनाये है , या कितने बिगाडे है
मगर एक बात जो मुझे लगती है...
वो ये .....
कि....
हमनें अपनें वादे निभाये है
एक दुसरे से किये वादे
एक दुसरे के लिये किये वादे....
आज सोचता हूं न... 'फ़राज़'.....
तो सचमुच....सचमुच
एक सपनां सा लगता है..
सपनां सा लगता है !!

राहुल उज्‍जैनकर 'फ़राज़'

Friday, May 18, 2012

मॉं तुझको खोजा करती हूं

निपट अकेली रातों में मैं
तुझको खोजा करती हूं
स्‍मृतियां जितनी भी है पास मेरे
मॉं, उनको जोडा करती हूं 

 तुम क्‍या रूठी मुझसे मॉं 
खुशीयों का दामन छुट गया 
चंचल-शोखी-अल्‍हड वाला
बचपन भी मुझसे रूठ गया
पापा की गोदी में भी 
गुमसुम अकेली सोया करती हूं 
                            निपट अकेली... स्‍मृतियां
धुंधली-धुधली यादें है,जब 
तुम लोरी सुनाया करती थी
हम पर अपनां स्‍नेह तुम 
सागर सा लुटाया करती थी
सिधे सरल रिश्‍ते क्‍युं भला
आज, ऐसे क्लिष्‍ट बनें 
अक्‍सर ये सोचा करती हूं  
                            निपट.......स्‍मृतियां

तुम कहती थी नां मॉं,जो हमसे
रूठ के जाते, तारे बना करते है
दूर आसमां से हमको वो फिर 
अपलक निहारा करते है 
इतनी सारी मॉंओं में, मॉं 
तुझको देखा करती हूं 
                             निपट...........स्‍मृतियां 

इक-इक पल में भी जानें
कितनी सदियां रहती हैं
 ऑंखों से अब आंसू नहीं
अश्‍को की नदियां बहती है 
तेरे स्‍नेहिल स्‍पर्शों का मैं
निसदिन अनुभव करती हूं 
                             निपट...........स्‍मृतियां 


तुमसे ही तो सिखा मैंने
मॉं की ममता बहन का स्‍नेह
रेशम की डोरी से बंधा 
अद्भुत और अलौकिक नेह 
अपरिपक्‍व इन रिश्‍तों को अपनें
ह्रदय रक्‍त से सिंचा करती हूं
                           निपट...........स्‍मृतियां 

बहनों का श्रृंगार किया 
नये रिश्‍तों का स्‍वीकार किया
उनका उनकी दुनियां में फिर 
खो जाना भी स्‍वीकार किया 
अपनें स्‍वयंवर में मगर..... 
पतझड वन सी रहती हूं 
                            निपट...........स्‍मृतियां 

अहंकरों के पाटों के बीच
पिसती ही क्‍यूं नारी है 
कन्‍यादान से भी बढकर, क्‍या 
अहं-दंभ ही भारी है 
वर्षों से ही इन प्रश्‍नों के
मैं, उत्‍तर खोजा करती हूं 
               निपट अकेली रातों में मैं
               तुझको खोजा करती हूं
               स्‍मृतियां जितनी भी है पास मेरे
               मॉं, उनको जोडा करती हूं
राहुल उज्‍जैनकर ''फराज'' 

Tuesday, May 01, 2012

मां सिर्फ शब्‍द नहीं है गीता है

मां सिर्फ शब्‍द नहीं है गीता है
कुरान की आयतें है
राम की कौशल्‍या है
कान्‍हा की मैया है
लव-कुशों की मां सीता है
               मां सिर्फ शब्‍द नहीं है गीता है
अविरत अपना प्रेम बहाती
उफ नां करती,क्रोध न करती
आडंबर, मद, लोभ न करती
कभी कृष्‍ण प्रेम मे मीरा बनती
कान्‍हा की कभी राधा बनकर
बहाती अद्भुत प्रेम सरिता है
               मां सिर्फ शब्‍द नहीं है गीता है
पृथ्‍वीराज का शौर्य सराहती
कपूतों के छल पर कराहती
पल-पल छलनी होते ह्रदय से
रायगढ से आस लगाती
शिवराय सा पुत्र जनने वाली
धन्‍य जिजाबाई वो माता है
               मां सिर्फ शब्‍द नहीं है गीता है
राहुल उज्‍जैनकर ''फराज''

Sunday, July 17, 2011

MUJHE TUMSE PYAR HAI........PRIYE

MUJHE TUMSE PYAR HAI........
« »


MAIN TUMSE PYAR KARTA HUN,
NHI INKAAR KARTAA MANN IS SACHCHAIE SE,
NHI TO KYUN SAMNE AATA HAI
KEVAL TUMHARA HI AKSH ?

KYUN KHOJ LETI HAIN AANKHEN
HAJAARON KI BHID ME BHI TUMHE ?

KYUN MADHUR LAGTI HAI
SIRF TUMHARI HI AAWAZ ?

NINDO KO KYUN UDAA LE JATA HAI
TUMHARA EHSAAS ?

JAHAA SE TUM GUJRE
BADHTE HAIN PAG KYUN USI PATH KO ?

BADHTE HAIN HANTH KYUN
 BANDHNE KO TUMHARI HI AAGOSH ME ?

KYUN SAMAA JANA CHAHTA HAI MANN
 TUMHARI HAR SAANS ME ?

YAH MITHYA NHI 'SACH' HAI...
KI MAIN TUMSE PYAR KARTA HU !!!

KI MUJHE TUMSE PYAR HAI !!!

--
RAHUL UJJAINKAR
B-13, Atulanchal Parisar
Janki Nagar, Badi Ukhri
Jabalpur (M. P.)
INDIA. Mobile - +91998-160-1628

Monday, September 20, 2010

Devaa Chee Maya....तोच जाणतो....

माग्च्या महेन्याची गोश्ट आहे, मी कामानी चाललो होतो... तीतक्यात पावसाला सूरवात झाली
आडोश्याला म्हणून एका दुकानाच्या शेड च्या खाली उभा झालो,
रसत्या च्या काठेला एक म्हातारी बसली होती,
त्या भर पावसात....सुद्धा !
मनांत किती तरी प्रश्न,धावा काढू लागले....
देव आहे कां ?
समजा तो आहे, म्हनटलं तर.....
एवढा निष्ठूर कां बरं ?
मागच्या जन्माचे पाप म्हणून आपण मोकळे होतो.....
खरचं, माग्चा किंवा पुढचा जन्म असतो ?
तरं मग, देवाला एकाच जन्मात, पाप वसूल करयची
एवढी घाई कां ?
दे त्याला १०-१२ जन्म अनं, करून...घे....वसूल
पण नकोरे....एवढे....दु:ख..........................!!!!
तसं पाहीलं तर, देव एवढा...निष्ठूर ही नाहीये....
एखाद्या सिंधी इसमाहून ही....१०० पटीनी...पूढे आहे..(म्हणूच तर आपण याला देव म्हणायचे)
त्यानी या म्हातारी ला दुःख तर दिले...पण
संवेदना मात्र हेरावून घेतली.....
जी काही संवेदना होती ती.... प्रेक्शका च्या मनांत...(अर्थात माझ्या)
आपल्याला ही देवा सारखे....(संवेदना शून्य होण्याचे) सामर्थ्य लाभो...
बघतो....मलां.....देव.....होता येतं कां ?
तो पर्यंत.....
.....हा ब्लाग आहेतच....मी एक सामान्य माणूस आहे म्हणून सांगायला...
..
..
--
RAHUL UJJAINKAR
B-13, Atulanchal Parisar
Janki Nagar, Badi Ukhri
Jabalpur (M. P.)
INDIA. Mobile - +91998-160-1628

Thursday, July 01, 2010

काश मैं पंछी होता

काश मैं पंछी होता !!

-=-=-=-=-=-=-=-=-=-=-=-=-=-=-

काश मैं पंछी होता
उडता खुले आकाश में
हवाओं से मैं बातें करता
उनसे उनकी कहानी सुनता
कुछ अपनी भी कहानी सुनाता
दूर देश की सैर को जाता, साथ अपनें
कुछ अनुभव लाता.....
किसी साथी से प्यार हो जाता..
उसके साथ दुनिया बसाता
फिर मेरे कुछ बच्चे होते, जब उनके...
पर नां निकले होते, तब उनका मैं....
हौसला बढाता, उंचे आकाश के किस्से सुनाता
इधर उधर की बातें करके.....
उनका अपना दिल बहलाता, कहते.......
पापा जल्दी आना..
साथ में ढेर सी बातें लानां, तब मैं उनसे कहता.....
बच्चों.....

अपनीं मां का कहना सुननां
शाम को जब मैं...
घर को आता, बच्चों को मैं जागा पाता....
कहते पापा.... कहानी सुनाओ !
इन्सानो का हाल बताओ ?
तब मैं....
उनसे कहता बच्चों......
इन्सानो का हाल ना पूछो !
कितना है बेहाल ना पूछो !
इक दुजे के खून का प्यासा.....
छोड चुका है सारी आशा...
नही रहा उसके पास कोई पर्दा..
छोड चुका वो सारी मर्यादा....
फिर मैं कहता सुनो बच्चों.........
इन्सानो की दुनिया नही है अच्छी.....
अपनी दुनिया ही है...
सीधी सच्ची....
अपनी दुनिया ही है, सीधी सच्ची....

(राहुल उज्जैनकर "फ़राज़")

प्यार वफ़ा इश्क की बातें, तुम करोगे ?प्यार वफ़ा इश्क की बातें, तुम करोगे ?

प्यार वफ़ा इश्क की बातें, तुम करोगे ? इमानो दिल,नज़ीर की बातें तुम करोगे ? तुम, जिसे समझती नही, दिल की जुबां मेरी आँखों मे आँखें डाल,बातें तुम...