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Friday, October 19, 2012

प्रेम म्हणजे

♥ ♥ प्रेम म्हणजे ♥ ♥
५ वर्षाची मुलगी :-
प्रेम म्हणजे, मी हळूच रोज त्याच्या दप्तरातील चोकलेट काढणे पण तरी
त्याचे नेहमी तिथेच चोकलेट ठेवणे. ♥
१० वर्षाची मुलगी :-
प्रेम म्हणजे, एकत्र अभ्यास करताना पेन्सिल घ्यायच्या बहाण्याने
मुद्दामहून त्याने माझ्या हाताला केलेला स्पर्श. ♥
१५ वर्षाची मुलगी :-
प्रेम म्हणजे, आम्ही शाळा बुडवल्या मुळे पकडले गेल्यावर
त्याने स्वताहा एकट्याने भोगलेली शिक्षा. ♥
१८ वर्षाची मुलगी :-
प्रेम म्हणजे, शाळेच्या निरोप समारंभात त्याने मारलेली मिठी आणि
खारट आश्रू पीत पुन्हा भेटण्याचीठेवलेली गोड अपेक्षा. ♥
२१ वर्षाची मुलगी :-
प्रेम म्हणजे, माझ्या कॉलेज ची सहल गेलेल्या ठिकाणी त्याने
त्याचे कॉलेज बुडवून अचानक दिलेली भेट. ♥
२६ वर्षाची मुलगी :-
प्रेम म्हणजे, गुढग्यावर बसून हातात गुलाबाचे फुल घेऊन
त्याने मला लग्ना साठी केलेली मागणी. ♥
३५ वर्षाची स्त्री :-
प्रेम म्हणजे, मी दमले आहे हे बघून त्याने स्वताहा केलेला स्वयंपाक. ♥
६० वर्षाची स्त्री :-
प्रेम म्हणजे, तो आजारीअसून, बरेच दिवस बेड वरच असूनसुद्धा मला हसवण्यासाठी त्याने केलेला विनोद. ♥
८० वर्षाची स्त्री :-
प्रेम म्हणजे, त्याने शेवटचा श्वास घेताना पुढल्या जन्मात लवकरच भेटण्याचे दिलेले वचन..♥
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Monday, February 27, 2012

सांझ गारवा क्रमशः

सांझ गारवा - अंश क्रमांक 5 (संध्‍याकाळचा पाउस मला गाणं गायला सांगायचा)






सांझ गारवा - अंश क्रमांक 6 (तू विसरू शकणार नाहीस)






सांझ गारवा - अंश क्रमांक 7 (आठवतय ?)



सांझ गारवा

सांझ गारवा - अंश क्रमांक 1 (संध्‍याकाळ जवळ आली की माझ असं होतं)









सांझ गारवा - अंश क्रमांक 2 (सळसळणारा वारा अन सोन पिवळया रानात)









सांझ गारवा - अंश क्रमांक 3 ( आता तुला सगळं जुनं आठवेल की नाही कुणास ठाउक )









सांझ गारवा - अंश क्रमांक 4
अशीच यावी वेळ एकदा, स्‍वप्‍नी देखील नसताना
असेच घडावे अवचित काही, तुझया समीप मी असताना

अश्‍याच एका संध्‍याकाळी, एकांताची वेळ अचानक
जवळ नसावे चिटट पाखरू, केवळ तुझी नी माझी जवळीक

संकोचाचे रेशीम पर्दे, हा हा म्‍हणता विरून जावे
समय सरावा मंद गतीने, अन प्रितीचे सूर जुळावे

मी मागवे तुझिया पाशी, असे काहीसे निघताना
उगीच करावे नको नको तू, हवे हवे से असताना

शब्‍दावाचून तूला कळावे, गूज मनी या लपलेले
मुक्‍त पणी तू उधळून द्यावे, जन्‍म भरीचे जपलेले ......
(सांझ गारवा यां सीडी मधील कवितेचा अंश)





Saturday, October 15, 2011

काही भावना असतात ज्या पोहचवू शकत नाही....इच्छा असून बरेच काही बोलू शकत नाही....असे एक ना अनेक बरेच अनूभव
प्रत्येकालाच आले असतील....फरक एवढाच असेल...."koi kahata hai koi chupata hai.....

आयुष्याला fullstop लागायच्या आधी
काहीतरी करून दाखवायचय,
लाखोन्च्या गर्दीत स्वतःसाठी
'red carpet' बनवायचय !!

आयुष्याला fullstop लागायच्या आधी
काहीतरी करून दाखवायचय,
आरशासमोर उभ राहून
नजर वर करून 'त्याला' बघायचय,
ताठ मानेनेच 'त्या' समोरच्याला विचारायचय,
तू फ़क्त बोल,अजून कोणत क्षितिज गाठायचय!!

आयुष्याला fullstop लागायच्या आधी
काहीतरी करून दाखवायचय,
सर्वान्च्या मनात एक छोटस
घर करून राहायचय,
माझ्या नुसत्या आठवणीन्तूनच
दुःखी मनान्ना हसवायचय,
एकदा का fullstop लागला
की आठवणीन्तूनच मला पुन्हा जगायचय!!

Saturday, August 06, 2011

sub say chup kar mila karo

kabhi dastaras mai jo waqt ho to tamam batain kaha karo
koi atay jatay na dekh lay, humay sub say chup kar mila karo

koi tum bhi taza sitam karo, yehi dard apna naseeb hai
nahi kuch gila, mujhay zakhm dou, kaha kis nay tum say wafa karo

meri jaan suno! zara ghoor say tumhay kah rahi hai ye chandani
chalay jub hawa sar-e-sham hi, to udaas yuu na huwa karo

ye tumharay honto'on par khamshi ka sakoot bhi to bhala nahi
kay tumhara lehja hai khusboo'n sa, gulaab bun kar khila karo

meray rabt say bhi ho munha'rif, meray naam say hi guraiz kyu?
chiray zikar jub bhi chah ka, zara hoslay say suna karo

ye kaha to tha mai nay barha, tumhay yaad hai kisi mour par
kay tum hi to ho meri zindagi, mujhay khud say yuu na juda karo

meray pass jitna nisaab hai inhi chahtoo'n ka hissab hai
ye tumharay gham ki kitaab hai isay dehaan say to parha karo

raho khush tabasm tum sada, mujhay chor dou meray haal par
mujhay ab talash-e-wafa nahi meray wastay na dua karo

Friday, August 05, 2011

ye aana jana theek nahin

Ek jabr hai ab ahsaas-e-wafa bhi ye dil me basana theek nahin
Ab saaz-e-dil afsurdah per, is geet ko gana theek nahin

Tum bhool chuke ye sab behtar ,tum chor chale ye aur acha
Khwabon mein mager majbooron ke ye aana jana theek nahin

Keh do ke nahin hum mil sakte, keh do ke koi majboori hai
Lekin ye labon tak la la ker, baton ko chupana theek nahin

E shooq-e-junoon ab baaz bhi aa, kuch maan bhi le tu mera kaha
Jo jaan ke bhi anjaan bane,gham usko sunana theek nahin

Ab chor bhi do deewana pan, ab bhool bhi jao maazi ko
E 'shams' ye pal pal khilwat mein ashkon ka bahana theek nahin...!

Sunday, July 17, 2011

MUJHE TUMSE PYAR HAI........PRIYE

MUJHE TUMSE PYAR HAI........
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MAIN TUMSE PYAR KARTA HUN,
NHI INKAAR KARTAA MANN IS SACHCHAIE SE,
NHI TO KYUN SAMNE AATA HAI
KEVAL TUMHARA HI AKSH ?

KYUN KHOJ LETI HAIN AANKHEN
HAJAARON KI BHID ME BHI TUMHE ?

KYUN MADHUR LAGTI HAI
SIRF TUMHARI HI AAWAZ ?

NINDO KO KYUN UDAA LE JATA HAI
TUMHARA EHSAAS ?

JAHAA SE TUM GUJRE
BADHTE HAIN PAG KYUN USI PATH KO ?

BADHTE HAIN HANTH KYUN
 BANDHNE KO TUMHARI HI AAGOSH ME ?

KYUN SAMAA JANA CHAHTA HAI MANN
 TUMHARI HAR SAANS ME ?

YAH MITHYA NHI 'SACH' HAI...
KI MAIN TUMSE PYAR KARTA HU !!!

KI MUJHE TUMSE PYAR HAI !!!

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RAHUL UJJAINKAR
B-13, Atulanchal Parisar
Janki Nagar, Badi Ukhri
Jabalpur (M. P.)
INDIA. Mobile - +91998-160-1628

आग की भीख

आग की भीख

 

-रामधारी सिंह दिनकर

 

धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा

कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा

कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है

मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है

दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे

बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे

प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ

चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ

 

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है

कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है

मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?

यह नाश रहा है या सौभाग्य का सितारा?

आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा

भगवान, इस तरी को भरमा दे अँधेरा

तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ

ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ

 

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है

बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है

अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है

है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है

निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है

निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है

पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ

जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ

 

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है

अरमान आरजू की लाशें निकल रही हैं

भीगी खुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं

सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं

इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे

पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे

उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ

विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ

 

आँसू भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे

मेरे शमशान में श्रंगी जरा बजा दे

फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे

हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे

आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे

अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे

विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ

बेचैन जिन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ

 

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे

जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे

गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे

इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे

हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे

अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे

प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ

तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ/.



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Saturday, July 16, 2011

कहते हैं तारे गाते हैं

कहते हैं तारे गाते हैं

कहते हैं तारे गाते हैं!
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमने कान लगाया,
फिर भी अगणित कंठों का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं!
कहते हैं तारे गाते हैं!

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथिवी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं!
कहते हैं तारे गाते हैं!

ऊपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा ऊपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं।
कहते हैं तारे गाते हैं!

- बच्चन



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अँधेरे का दीपक

अँधेरे का दीपक

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था ,

भावना के हाथ से जिसमें वितानों को तना था,

स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,

स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था,

ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर कंकड़ों को

एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

बादलों के अश्रु से धोया गया नभनील नीलम

का बनाया था गया मधुपात्र मनमोहक, मनोरम,

प्रथम उशा की किरण की लालिमासी लाल मदिरा

थी उसी में चमचमाती नव घनों में चंचला सम,

वह अगर टूटा मिलाकर हाथ की दोनो हथेली,

एक निर्मल स्रोत से तृष्णा बुझाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या घड़ी थी एक भी चिंता नहीं थी पास आई,

कालिमा तो दूर, छाया भी पलक पर थी छाई,

आँख से मस्ती झपकती, बातसे मस्ती टपकती,

थी हँसी ऐसी जिसे सुन बादलों ने शर्म खाई,

वह गई तो ले गई उल्लास के आधार माना,

पर अथिरता पर समय की मुसकुराना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय, वे उन्माद के झोंके कि जिसमें राग जागा,

वैभवों से फेर आँखें गान का वरदान माँगा,

एक अंतर से ध्वनित हो दूसरे में जो निरन्तर,

भर दिया अंबरअवनि को मत्तता के गीत गागा,

अन्त उनका हो गया तो मन बहलने के लिये ही,

ले अधूरी पंक्ति कोई गुनगुनाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

हाय वे साथी कि चुम्बक लौहसे जो पास आए,

पास क्या आए, हृदय के बीच ही गोया समाए,

दिन कटे ऐसे कि कोई तार वीणा के मिलाकर

एक मीठा और प्यारा ज़िन्दगी का गीत गाए,

वे गए तो सोचकर यह लौटने वाले नहीं वे,

खोज मन का मीत कोई लौ लगाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

क्या हवाएँ थीं कि उजड़ा प्यार का वह आशियाना,

कुछ आया काम तेरा शोर करना, गुल मचाना,

नाश की उन शक्तियों के साथ चलता ज़ोर किसका,

किन्तु निर्माण के प्रतिनिधि, तुझे होगा बताना,

जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम से,

पर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है?

है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?

- बच्चन


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प्यार वफ़ा इश्क की बातें, तुम करोगे ?प्यार वफ़ा इश्क की बातें, तुम करोगे ?

प्यार वफ़ा इश्क की बातें, तुम करोगे ? इमानो दिल,नज़ीर की बातें तुम करोगे ? तुम, जिसे समझती नही, दिल की जुबां मेरी आँखों मे आँखें डाल,बातें तुम...