Sunday, July 24, 2022

फिर से तलवे चाट आये हैं

घर घर आज वे फिरसे पर्चे बांट आये है ।
चढ़ते सूरज के फिरसे तलवे चाट आये हैं ।

वो भी खुश हैं कि, उनके चप्पलों की गर्द मिट गई
ये भी धन्य हुए,के बिछनें से कदमों में ठाठ आये है 

टके-टके पर बिक रहे हैं, सब्जी-तरकारी जैसे । 
इन्हें लगता है, ये शान से किसी हाट आये है । 

कदमों में बिछने के शौकीन इतने की,भूल गए ।
ये बज़्म में उनकी, अपनी गरिमा छांट आये है ।

मतलब से बने रिश्ते भला, कब तलक साथ चलेंगे ।
खुदगर्ज़ी इसकदर हावी है,कि नेकियाँ पाट आये हैं । 

आज इतराने दो उन्हें फ़राज़, ये भी यकीन जानों ।
वक़्त आने पर सभी,चार काँधों पर ही घाट आये हैं ।
©®राहुल फ़राज़

उम्मीदों का कारवां रुका तो है

दिल मे उम्मीदों का कारवां रुका तो है
कुछ भी कहलो,लेकिन दिल दुखा तो है 
 
जितनी भी थी ख्वाहिशें उनने दबाकर रखदी
ख्वाहिशों में भी बगवात का जिक्र हुआ तो है 

बंदिशें कोई कितनी ही लगा ले,इन पलकों पर
रुखसार पे मगर,अश्कों का असर हुआ तो है 

कितनी ही यादें हमने संजोयी है, साथ-साथ
गुजरते वक़्त के साथ राब्ता कम हुआ तो है
राब्ता=मेलमिलाप/संबंध 

जज़्बा-ए-दिल है मोहब्बत,कोई शर्त-गाह नही 
फ़राज़ उफ्फ करता नही,मगर दर्द हुआ तो है
©®राहुल फ़राज़ 
जज़्बा-ए-दिल=दिल की खुशी
शर्त-गाह=जहां शर्त के साथ कोई काम होता हो 

ज़ख्म गहरे उतर जाते हैं

बिखरकर संवरने का मैं रखूं हौसला कबतक ?
उफ्फ, यूं उम्मीदों पर जीना, आखिर कबतक ?

ज़ख्म गहरे उतर जाते है, कुछ और भी गहरे
समंदर में यूं सीप, खोजना, आखिर कबतक ?

तेरे उसूल, मेरी तमन्नाओं का टकराना लाज़मी नही
दिलों-दिमाग की जंग में पिसना,आखिर कबतक ?
लाज़मी=ज़रूरी 

बेशुमार थी दीवानगी गर, तो मोहब्बत आज भी है
पुराने वक़्त को यूं ही थामे रहना, आखिर कबतक

वक़्त की है खूबी फ़राज़, लौटकर वक़्त नही आता 
हर वक़्त, वक़्त का इन्तिज़ार आखिर कबतक...?
©®राहुल फ़राज़ 

ज़र्फ था न हुनर कोई

ज़र्फ़ था न हुनर कोई  ,        .दीवाने जैसा 
मैं फिसल जाता,बहक जाता, जमाने जैसा 
ज़र्फ़=योग्यता/सामर्थ्य

हर तरफ धुंध थी, कोहरा था, बराबर मेरे
तेरी यादों का सिलसिला था, रुलाने जैसा 
ज़र्फ़ था न.....

किश्तियाँ छोड़ दी, दरिया की निगेहबानी में
कितना मासूम था वो बचपन तुम्हारे जैसा 
ज़र्फ़ था न.....….

दिल मिले थे जवाँ लेकिन, लकीरें न मिली
लो टूट गया मेरा दिल भी, खिलौने जैसा 
ज़र्फ़ था न.....

क्या करें सोज़ के, हासिल न हुआ कुछ भी 
अब बचा क्या है फ़राज़ उनको, बताने जैसा 
ज़र्फ़ था न हुनर कोई  ,        .दीवाने जैसा 
©®राहुल फ़राज़ 
सोज़=दुःख

अपनें बदल गए हैं

एक रात में ही रिश्तों के मंजर बदल गए हैं 
नज़रों के अंदाज़,हाथों के खंज़र बदल गए है 

वो दावा करते हैं, दौरे ए मुश्किल में साथ देंगे
हम मजबूर क्या हुए, उनके तेवर बदल गए हैं 

जागते रहते थे, कभी साथ मेरे , मगर आज 
हमें नींद क्या आयी, उनके ख्वाब बदल गए हैं

जानतां हूँ,वक़्ते आखिर मुझे तन्हा रह जाना है
वक़्त के साथ क्या बेवक़्त भी,अपनें बदल गए हैं 

वादे पे ऐतबार के सिवा,तेरे हिस्से आया क्या फ़राज़
सख्त जान हो तुम,वर्ना इंतज़ार में लोग बदल गए है 
©®राहुल फ़राज़
DT:२४/०७/२०२२

Saturday, July 23, 2022

मैं मर गया तो ?

कोई बताएं बाद इसके, हालात  क्या होंगे
मैं गर, मर गया, तो फिर फसादात क्या होंगे 

किसी की आंख में न होगा अश्क मैं जानता हूँ
खुश्क आंखों में तब फिर सवालात क्या होंगे 

घर के किस कोने में दुबक जाएंगी सब यादें मेरी 
मेरी सजाई चीजों के, तब जज़्बात क्या होंगे 

किस चेहरे पर आएगी रौनक,किसका नूर बदलेगा 
पलपल बदलते लोगों के, फिर सबात क्या होंगे 
सबात=स्थायित्व 

बाद मौत के, तंज भी मुझपर, खूब कसेंगे लोग 
फ़राज़ उनके दिलों में नए, खुराफात क्या होंगे 
©®राहुल फ़राज़ 
Dt:२३/०७/२०२२

Friday, July 22, 2022

मुसीबतों का अंबार लगा दो

मेरे रास्तों में मुसीबतों का अंबार लगा दो तुम 
ये रास्ता न बदला जाएगा अंगार लगा दो तुम 

इक-इक कदम, बढ़ रहा हूँ मैं मंजिल की जानिब
तुम्हारी जितनी भी कूवत है,उतना जोर लगादो तुम

तेरी औकात से बढ़कर तो, मेरा रुतबा है ! नादान 
कदमोँ तक न पँहुचोगे, जितनी छलांग लगादो तुम

दोजख के कीड़े हो, यूंही बिल-बिलाते, रेंगते ही रहोगे 
मेरा नाखून न मैला होगा,जितना कीचड़ उछालदो तुम 

छीनकर रोशनी गैर की, करोगे घर मे उजाला कब तक 
उजाले ये धरे रह जाएंगे, जितनी मर्ज़ी दिये लगालो तुम 

तेरे मन भटकने का इलाज बस इतना है अहमक 
सुबह-ओ-शाम फ़राज़-ए-गली में फेरे लगादो तुम
©®राहुल फ़राज़

प्यार वफ़ा इश्क की बातें, तुम करोगे ?प्यार वफ़ा इश्क की बातें, तुम करोगे ?

प्यार वफ़ा इश्क की बातें, तुम करोगे ? इमानो दिल,नज़ीर की बातें तुम करोगे ? तुम, जिसे समझती नही, दिल की जुबां मेरी आँखों मे आँखें डाल,बातें तुम...